बालकाण्ड

दोहा 138

5 पद

Chaupai1 / 5
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।। तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना।।
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जब श्रीहरि ने माया दूर हटाई — न वहाँ रमा (लक्ष्मी), न राजकुमारी। तब मुनि (नारद) अत्यन्त भयभीत — श्रीहरि के चरण पकड़े — (कहा) रक्षा करो, प्रणत (शरणागत) की आर्ति (पीड़ा) हरने वाले!
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
When Hari withdrew his Maya, neither Lakshmi nor the princess was there any longer. Then the sage, greatly frightened, clasped Hari's feet, crying, 'Protect me, O reliever of the suppliant's distress!'
Chaupai2 / 5
मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला।। मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे।।
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(नारद ने कहा) मिथ्या हो मेरा शाप, कृपालु! दीनदयालु (विष्णु) ने कहा — मेरी इच्छा (से ही सब हुआ)। (नारद ने कहा) मैंने बहुत दुर्वचन कहे — मुनि बोले — मेरे पाप कैसे मिटेंगे?
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Let my curse become false, O compassionate Lord!' 'It is my will,' said the merciful one. 'I spoke many harsh words,' said the sage; 'how shall my sins be cleansed?'
Chaupai3 / 5
जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा।। कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें।।
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(श्रीहरि ने कहा) जाकर शंकर के सौ नामों का जप करो — हृदय में तुरन्त विश्राम (शान्ति) होगा। शिव-समान मुझे कोई प्रिय नहीं — यह प्रतीति (विश्वास) भूलकर भी मत त्यागो।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Go and chant the hundred names of Shankara; your heart will find peace at once. No one is as dear to me as Shiva; never abandon this faith, not even in confusion.'
Chaupai4 / 5
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।। अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई।।
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(श्रीहरि ने कहा) जिस पर पुरारि (शिवजी) कृपा नहीं करें — वह मुनि! हमारी भक्ति नहीं पाता। यह हृदय में धारण करके पृथ्वी पर विचरो — अब तुम्हें माया निकट नहीं आएगी।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'One upon whom the destroyer of Tripura does not bestow his grace can never obtain devotion to me, O sage. Hold this truth in your heart and go wander the earth; henceforth, Maya shall never come near you.'
Doha5 / 5
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।। सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान।।138।।
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बहु विधि मुनि को प्रबोधित (समझाकर) करके प्रभु तब अन्तर्धान हुए। सत्यलोक नारद चले — श्रीराम-गुण-गान करते।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
Having consoled the sage in many ways, the Lord then vanished from sight. Narada went to Satyaloka, singing the glories of Rama.

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