Uttar Kand

उत्तरकाण्ड

130 Dohas

Doha 0

केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं

3 verses

Doha 1

रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।।

6 verses

Doha 2

देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।

11 verses

Doha 3

हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।।

8 verses

Doha 4

इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।।

6 verses

Doha 5

आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।।

7 verses

Doha 6

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।।

8 verses

Doha 7

सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।।

5 verses

Doha 8

लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।।

7 verses

Doha 9

कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।।

7 verses

Doha 10

प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।

6 verses

Doha 11

अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।।

7 verses

Doha 12

प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।।

9 verses

Doha 13

जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।

8 verses

Doha 14

जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।

7 verses

Doha 15

सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी।।

6 verses

Doha 16

बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।

5 verses

Doha 17

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।।

6 verses

Doha 18

सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।।

6 verses

Doha 19

भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।।

8 verses

Doha 20

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।

5 verses

Doha 21

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।

5 verses

Doha 22

भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।।

5 verses

Doha 23

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।।

6 verses

Doha 24

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।।

6 verses

Doha 25

सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।।

5 verses

Doha 26

प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।।

5 verses

Doha 27

नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।।

6 verses

Doha 28

सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।।

6 verses

Doha 29

दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।

6 verses

Doha 30

जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।।

6 verses

Doha 31

जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।।

5 verses

Doha 32

भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।।

5 verses

Doha 33

कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।।

5 verses

Doha 34

सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।।

5 verses

Doha 35

देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।।

6 verses

Doha 36

सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।।

5 verses

Doha 37

करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।।

5 verses

Doha 38

बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।।

5 verses

Doha 39

सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।।

5 verses

Doha 40

लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न।।

5 verses

Doha 41

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।

5 verses

Doha 42

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।।

5 verses

Doha 43

एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।।

5 verses

Doha 44

एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।।

5 verses

Doha 45

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू।।

5 verses

Doha 46

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।।

5 verses

Doha 47

सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के।।

5 verses

Doha 48

एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए।।

5 verses

Doha 49

जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा।।

5 verses

Doha 50

अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए।।

6 verses

Doha 51

मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।

6 verses

Doha 52

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।।

7 verses

Doha 53

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।।

5 verses

Doha 54

नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।।

5 verses

Doha 55

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा।।

6 verses

Doha 56

मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि।।

6 verses

Doha 57

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।

6 verses

Doha 58

गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा।।

5 verses

Doha 59

नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।।

5 verses

Doha 60

तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ।।

5 verses

Doha 61

तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा।।

5 verses

Doha 62

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।

7 verses

Doha 63

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।।

6 verses

Doha 64

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।।

6 verses

Doha 65

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा।।

5 verses

Doha 66

कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।।

6 verses

Doha 67

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए।।

6 verses

Doha 68

निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना।।

6 verses

Doha 69

देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।।

6 verses

Doha 70

बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।

6 verses

Doha 71

गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही।।

6 verses

Doha 72

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा।।

6 verses

Doha 73

असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।।

7 verses

Doha 74

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।।

6 verses

Doha 75

राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई।।

6 verses

Doha 76

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक।।

5 verses

Doha 77

अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।

7 verses

Doha 78

एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।।

6 verses

Doha 79

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।।

6 verses

Doha 80

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।।

6 verses

Doha 81

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता।।

6 verses

Doha 82

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।।

6 verses

Doha 83

देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।।

6 verses

Doha 84

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना।।

6 verses

Doha 85

एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक।।

6 verses

Doha 86

अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।

6 verses

Doha 87

एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।।

6 verses

Doha 88

कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही।।

6 verses

Doha 89

मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला।।

6 verses

Doha 90

बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।।

6 verses

Doha 91

निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई।।

6 verses

Doha 92

प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला।।

7 verses

Doha 93

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए।।

6 verses

Doha 94

तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा।।

6 verses

Doha 95

गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा।।

6 verses

Doha 96

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।।

7 verses

Doha 97

तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई।।

6 verses

Doha 98

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।।

6 verses

Doha 99

नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई।।

6 verses

Doha 100

पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।।

7 verses

Doha 101

बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।।

5 verses

Doha 102

अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।।

5 verses

Doha 103

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।।

6 verses

Doha 104

नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।।

6 verses

Doha 105

गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।।

6 verses

Doha 106

एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।।

10 verses

Doha 107

मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।।

6 verses

Doha 108

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।

9 verses

Doha 109

एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।।

12 verses

Doha 110

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।।

12 verses

Doha 111

तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।।

10 verses

Doha 112

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।।

10 verses

Doha 113

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।।

10 verses

Doha 114

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ।।

10 verses

Doha 115

जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।।

10 verses

Doha 116

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।।

6 verses

Doha 117

सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।।

12 verses

Doha 118

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।।

10 verses

Doha 119

ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।।

7 verses

Doha 120

कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।।

12 verses

Doha 121

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।।

21 verses

Doha 122

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।

13 verses

Doha 123

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा।।

6 verses

Doha 124

सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना।।

6 verses

Doha 125

मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी।।

7 verses

Doha 126

कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा।।

5 verses

Doha 127

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।

5 verses

Doha 128

मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।।

5 verses

Doha 129

राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।।

5 verses

Doha 130

यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा।।

10 verses