Sundar Kand

सुन्दरकाण्ड

60 Dohas

Doha 0

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं

3 verses

Doha 1

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।

6 verses

Doha 2

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।

7 verses

Doha 3

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।

10 verses

Doha 4

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।

5 verses

Doha 5

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।

5 verses

Doha 6

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।

5 verses

Doha 7

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।

5 verses

Doha 8

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।

5 verses

Doha 9

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।

6 verses

Doha 10

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।

6 verses

Doha 11

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।

5 verses

Doha 12

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।

7 verses

Doha 13

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।

7 verses

Doha 14

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।

6 verses

Doha 15

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।

6 verses

Doha 16

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।

6 verses

Doha 17

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।

6 verses

Doha 18

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।

5 verses

Doha 19

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।

6 verses

Doha 20

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।

5 verses

Doha 21

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।

6 verses

Doha 22

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।

6 verses

Doha 23

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।

5 verses

Doha 24

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।

6 verses

Doha 25

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।

6 verses

Doha 26

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।

5 verses

Doha 27

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।

5 verses

Doha 28

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।

5 verses

Doha 29

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।

5 verses

Doha 30

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।

5 verses

Doha 31

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।

6 verses

Doha 32

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।

5 verses

Doha 33

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।

6 verses

Doha 34

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।

5 verses

Doha 35

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।

8 verses

Doha 36

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।

6 verses

Doha 37

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।

6 verses

Doha 38

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।

5 verses

Doha 39

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।

6 verses

Doha 40

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।

5 verses

Doha 41

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।

6 verses

Doha 42

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।

5 verses

Doha 43

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

6 verses

Doha 44

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।

5 verses

Doha 45

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।

5 verses

Doha 46

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।

5 verses

Doha 47

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।

5 verses

Doha 48

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।

5 verses

Doha 49

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।

7 verses

Doha 50

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।

5 verses

Doha 51

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।

5 verses

Doha 52

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।

5 verses

Doha 53

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।

5 verses

Doha 54

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।

5 verses

Doha 55

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।

5 verses

Doha 56

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।

7 verses

Doha 57

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।

7 verses

Doha 58

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।

5 verses

Doha 59

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।

5 verses

Doha 60

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।

8 verses