Lanka Kand
लङ्काकाण्ड
121 Dohas
Doha 0
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं
3 verses
Doha 1
यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा।।
6 verses
Doha 2
सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं।।
5 verses
Doha 3
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।।
6 verses
Doha 4
बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा।।
6 verses
Doha 5
अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई।।
6 verses
Doha 6
निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी।।
6 verses
Doha 7
नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई।।
5 verses
Doha 8
तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई।।
6 verses
Doha 9
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती।।
6 verses
Doha 10
यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।।
6 verses
Doha 11
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।।
6 verses
Doha 12
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी।।
7 verses
Doha 13
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा।।
6 verses
Doha 14
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।।
5 verses
Doha 15
पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा।।
6 verses
Doha 16
बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना।।
6 verses
Doha 17
इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।।
6 verses
Doha 18
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।।
6 verses
Doha 19
तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।।
5 verses
Doha 20
कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।।
5 verses
Doha 21
रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।।
6 verses
Doha 22
सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।।
6 verses
Doha 23
तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।।
11 verses
Doha 24
धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।।
9 verses
Doha 25
सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला।।
5 verses
Doha 26
सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी।।
5 verses
Doha 27
सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई।।
5 verses
Doha 28
सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई।।
5 verses
Doha 29
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला।।
6 verses
Doha 30
अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही।।
5 verses
Doha 31
जौ अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई।।
6 verses
Doha 32
जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा।।
7 verses
Doha 33
एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु।।
7 verses
Doha 34
मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक।।
9 verses
Doha 35
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।।
9 verses
Doha 36
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।।
8 verses
Doha 37
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला।।
5 verses
Doha 38
नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना।।
7 verses
Doha 39
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए।।
6 verses
Doha 40
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी।।
6 verses
Doha 41
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे।।
6 verses
Doha 42
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा।।
6 verses
Doha 43
भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे।।
5 verses
Doha 44
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर।।
5 verses
Doha 45
महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं।।
5 verses
Doha 46
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए।।
7 verses
Doha 47
सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना।।
5 verses
Doha 48
निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी।।
6 verses
Doha 49
परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही।।
7 verses
Doha 50
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता।।
5 verses
Doha 51
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला।।
5 verses
Doha 52
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा।।
5 verses
Doha 53
छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला।।
5 verses
Doha 54
घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे।।
5 verses
Doha 55
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू।।
5 verses
Doha 56
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी।।
5 verses
Doha 57
अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया।।
5 verses
Doha 58
कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा।।
5 verses
Doha 59
परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक।।
5 verses
Doha 60
तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी।।
6 verses
Doha 61
उहाँ राम लछिमनहिं निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी।।
10 verses
Doha 62
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।।
7 verses
Doha 63
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा।।
5 verses
Doha 64
महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना।।
6 verses
Doha 65
बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन।।
6 verses
Doha 66
उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला।।
6 verses
Doha 67
कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा।।
5 verses
Doha 68
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा।।
5 verses
Doha 69
कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति धन माझ निसाचर धारी।।
5 verses
Doha 70
भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा।।
7 verses
Doha 71
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो।।
8 verses
Doha 72
दिन कें अंत फिरीं दोउ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी।।
7 verses
Doha 73
सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना।।
8 verses
Doha 74
चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी।।
7 verses
Doha 75
मेघनाद के मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी।।
8 verses
Doha 76
जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा।।
9 verses
Doha 77
बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो।।
5 verses
Doha 78
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन।।
7 verses
Doha 79
चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा।।
9 verses
Doha 80
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।।
9 verses
Doha 81
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना।।
7 verses
Doha 82
धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर।।
6 verses
Doha 83
रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू।।
6 verses
Doha 84
जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा।।
6 verses
Doha 85
इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई।।
6 verses
Doha 86
चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर।।
7 verses
Doha 87
एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी।
7 verses
Doha 88
मज्जहि भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला।।
7 verses
Doha 89
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा।।
6 verses
Doha 90
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा।।
7 verses
Doha 91
कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़ै सर।।
6 verses
Doha 92
चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा।।
9 verses
Doha 93
दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी।।
6 verses
Doha 94
आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा।।
6 verses
Doha 95
देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी।।
6 verses
Doha 96
अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका।।
6 verses
Doha 97
प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी।।
6 verses
Doha 98
सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी।।
10 verses
Doha 99
तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई।।
9 verses
Doha 100
अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई।।
8 verses
Doha 101
जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड।।
8 verses
Doha 102
काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।
7 verses
Doha 103
सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा।।
9 verses
Doha 104
पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी।।
9 verses
Doha 105
मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना।।
5 verses
Doha 106
आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो।।
6 verses
Doha 107
पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना।।
6 verses
Doha 108
अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता।।
8 verses
Doha 109
प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता।।
8 verses
Doha 110
तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई।।
7 verses
Doha 111
जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे।।
7 verses
Doha 112
तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए।।
5 verses
Doha 113
जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम।।
6 verses
Doha 114
सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसचरन्हि जे मारे।।
7 verses
Doha 115
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।
4 verses
Doha 116
करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए।।
8 verses
Doha 117
सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के।।
6 verses
Doha 118
भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए।।
8 verses
Doha 119
अतिसय प्रीति देख रघुराई। लिन्हे सकल बिमान चढ़ाई।।
8 verses
Doha 120
तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा।।
7 verses
Doha 121
प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई।।
10 verses