Kishkindha Kand

किष्किन्धाकाण्ड

30 Dohas

Doha 0

कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ

1 verse

Doha 1

आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।।

6 verses

Doha 2

कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।।

6 verses

Doha 3

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।

5 verses

Doha 4

देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।।

5 verses

Doha 5

कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।।

5 verses

Doha 6

नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।।

8 verses

Doha 7

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।

16 verses

Doha 8

अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।।

5 verses

Doha 9

परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।।

6 verses

Doha 10

सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।।

6 verses

Doha 11

राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।।

6 verses

Doha 12

उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।

6 verses

Doha 13

सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।।

5 verses

Doha 14

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।

5 verses

Doha 15

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।

8 verses

Doha 16

बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।।

6 verses

Doha 17

सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।

5 verses

Doha 18

बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।।

5 verses

Doha 19

इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।।

5 verses

Doha 20

चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।।

6 verses

Doha 21

नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।।

5 verses

Doha 22

बानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा।।

5 verses

Doha 23

सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।।

8 verses

Doha 24

कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।।

5 verses

Doha 25

दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा।।

5 verses

Doha 26

इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं।।

8 verses

Doha 27

एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती।।

7 verses

Doha 28

अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।।

7 verses

Doha 29

जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर ।।

5 verses

Doha 30

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।

9 verses