Ayodhya Kand (अयोध्याकाण्ड)

Ramcharitmanas verses with Hindi meaning & English translation

326 Dohas · 1633 verses

Ayodhya Kand narrates Kaikeyi's two boons, Shri Ram's fourteen-year exile with Sita and Lakshman, the grief and death of King Dasharath, and Bharat's journey to Chitrakoot to plead for Ram's return.

Read the full Ayodhya Kand paath

Mangalacharan

यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके

3 verses

Doha 1

जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।

5 verses

Doha 2

एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।

5 verses

Doha 3

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।

5 verses

Doha 4

सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।

5 verses

Doha 5

मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।

5 verses

Doha 6

हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।

5 verses

Doha 7

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।

5 verses

Doha 8

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।

5 verses

Doha 9

तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।

5 verses

Doha 10

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।

5 verses

Doha 11

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।

5 verses

Doha 12

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।

5 verses

Doha 13

दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।

5 verses

Doha 14

कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।

5 verses

Doha 15

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।

5 verses

Doha 16

एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।

5 verses

Doha 17

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।

5 verses

Doha 18

चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।

5 verses

Doha 19

भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।

5 verses

Doha 20

कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।

5 verses

Doha 21

नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।

5 verses

Doha 22

कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।

5 verses

Doha 23

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।

5 verses

Doha 24

बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।

5 verses

Doha 25

कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।।

5 verses

Doha 26

अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।।

5 verses

Doha 27

पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।।

5 verses

Doha 28

जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।

5 verses

Doha 29

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।

6 verses

Doha 30

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।

5 verses

Doha 31

आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।

5 verses

Doha 32

राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।।

5 verses

Doha 33

जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।

5 verses

Doha 34

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।

5 verses

Doha 35

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।

5 verses

Doha 36

चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।

5 verses

Doha 37

राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।

5 verses

Doha 38

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।

5 verses

Doha 39

आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।।

5 verses

Doha 40

सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।

5 verses

Doha 41

निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।।

5 verses

Doha 42

भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।

5 verses

Doha 43

रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।।

5 verses

Doha 44

अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।।

5 verses

Doha 45

अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।

5 verses

Doha 46

धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।

5 verses

Doha 47

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।

5 verses

Doha 48

का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।।

5 verses

Doha 49

एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।

5 verses

Doha 50

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।

4 verses

Doha 51

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।

5 verses

Doha 52

रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।।

5 verses

Doha 53

तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।

5 verses

Doha 54

बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।।

5 verses

Doha 55

राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।

5 verses

Doha 56

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।

5 verses

Doha 57

देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।।

5 verses

Doha 58

दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।

5 verses

Doha 59

मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।

5 verses

Doha 60

बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।।

5 verses

Doha 61

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।।

5 verses

Doha 62

मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।।

5 verses

Doha 63

नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।

5 verses

Doha 64

सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।

5 verses

Doha 65

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।।

5 verses

Doha 66

बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।।

5 verses

Doha 67

मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।।

5 verses

Doha 68

अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।।

5 verses

Doha 69

लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।।

5 verses

Doha 70

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।

5 verses

Doha 71

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।

5 verses

Doha 72

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।।

5 verses

Doha 73

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।।

5 verses

Doha 74

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।।

5 verses

Doha 75

पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।

6 verses

Doha 76

गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।।

5 verses

Doha 77

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।।

5 verses

Doha 78

रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।।

5 verses

Doha 79

सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।।

5 verses

Doha 80

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।।

5 verses

Doha 81

एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।

5 verses

Doha 82

जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।।

5 verses

Doha 83

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।।

5 verses

Doha 84

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।

5 verses

Doha 85

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।।

5 verses

Doha 86

जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।।

5 verses

Doha 87

सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।

5 verses

Doha 88

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।

5 verses

Doha 89

राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।।

5 verses

Doha 90

उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।

5 verses

Doha 91

बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।

5 verses

Doha 92

भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।।

5 verses

Doha 93

अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।।

5 verses

Doha 94

सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू।।

5 verses

Doha 95

तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।

5 verses

Doha 96

तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।

5 verses

Doha 97

बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।।

5 verses

Doha 98

पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।

5 verses

Doha 99

प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।।

5 verses

Doha 100

जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।

5 verses

Doha 101

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।।

5 verses

Doha 102

उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।

5 verses

Doha 103

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।

5 verses

Doha 104

गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।।

5 verses

Doha 105

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।।

5 verses

Doha 106

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।

5 verses

Doha 107

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।।

5 verses

Doha 108

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।।

5 verses

Doha 109

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।

5 verses

Doha 110

सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।।

5 verses

Doha 111

राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।।

5 verses

Doha 112

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।।

5 verses

Doha 113

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।।

5 verses

Doha 114

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।

5 verses

Doha 115

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।।

5 verses

Doha 116

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।।

5 verses

Doha 117

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।।

5 verses

Doha 118

पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।।

5 verses

Doha 119

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।।

4 verses

Doha 120

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।।

5 verses

Doha 121

नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।।

5 verses

Doha 122

गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।।

5 verses

Doha 123

आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।।

5 verses

Doha 124

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।।

5 verses

Doha 125

मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।

5 verses

Doha 126

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।।

5 verses

Doha 127

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।

5 verses

Doha 128

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।।

5 verses

Doha 129

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।।

4 verses

Doha 130

काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।

5 verses

Doha 131

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।।

5 verses

Doha 132

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।।

5 verses

Doha 133

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।।

5 verses

Doha 134

अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।।

5 verses

Doha 135

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।।

5 verses

Doha 136

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।।

5 verses

Doha 137

रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।

5 verses

Doha 138

केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।।

5 verses

Doha 139

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।

5 verses

Doha 140

राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।।

5 verses

Doha 141

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।।

5 verses

Doha 142

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।।

5 verses

Doha 143

धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।।

5 verses

Doha 144

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।।

5 verses

Doha 145

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।।

5 verses

Doha 146

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।।

5 verses

Doha 147

एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।

5 verses

Doha 148

अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।।

5 verses

Doha 149

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।।

5 verses

Doha 150

पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।

5 verses

Doha 151

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।।

5 verses

Doha 152

पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।।

5 verses

Doha 153

तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।।

5 verses

Doha 154

प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।।

5 verses

Doha 155

धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।

5 verses

Doha 156

जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।।

5 verses

Doha 157

तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।।

5 verses

Doha 158

चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।

5 verses

Doha 159

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।।

5 verses

Doha 160

तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।।

5 verses

Doha 161

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।

5 verses

Doha 162

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।।

5 verses

Doha 163

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।

5 verses

Doha 164

भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।

5 verses

Doha 165

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।

5 verses

Doha 166

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।।

5 verses

Doha 167

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।

5 verses

Doha 168

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।

5 verses

Doha 169

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।

5 verses

Doha 170

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।।

5 verses

Doha 171

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।

5 verses

Doha 172

अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।

5 verses

Doha 173

बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।

5 verses

Doha 174

सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।

5 verses

Doha 175

अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।

5 verses

Doha 176

कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।

5 verses

Doha 177

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।।

5 verses

Doha 178

हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।

5 verses

Doha 179

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।।

5 verses

Doha 180

कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।।

5 verses

Doha 181

कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।।

5 verses

Doha 182

गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।।

5 verses

Doha 183

आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।।

5 verses

Doha 184

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।।

5 verses

Doha 185

भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।।

5 verses

Doha 186

घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।।

5 verses

Doha 187

चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।।

5 verses

Doha 188

राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।।

5 verses

Doha 189

सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।।

5 verses

Doha 190

होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।।

5 verses

Doha 191

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।

5 verses

Doha 192

राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।।

5 verses

Doha 193

लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।

5 verses

Doha 194

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।।

5 verses

Doha 195

नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।।

5 verses

Doha 196

कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।

5 verses

Doha 197

सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।।

5 verses

Doha 198

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।।

5 verses

Doha 199

कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।।

5 verses

Doha 200

लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।।

5 verses

Doha 201

राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ।।

5 verses

Doha 202

सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।।

6 verses

Doha 203

कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।।

5 verses

Doha 204

झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।।

5 verses

Doha 205

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।

5 verses

Doha 206

प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।।

5 verses

Doha 207

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।।

5 verses

Doha 208

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।।

5 verses

Doha 209

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।

5 verses

Doha 210

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।।

5 verses

Doha 211

मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।।

5 verses

Doha 212

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।।

5 verses

Doha 213

सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।।

5 verses

Doha 214

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।।

5 verses

Doha 215

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।।

5 verses

Doha 216

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।।

5 verses

Doha 217

जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।।

5 verses

Doha 218

बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने।।

5 verses

Doha 219

सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।।

5 verses

Doha 220

सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी।।

5 verses

Doha 221

जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू।।

5 verses

Doha 222

कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं।।

5 verses

Doha 223

भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।।

5 verses

Doha 224

निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।

5 verses

Doha 225

मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।।

5 verses

Doha 226

सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।।

4 verses

Doha 227

बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।।

5 verses

Doha 228

बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।

5 verses

Doha 229

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।

5 verses

Doha 230

उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।

5 verses

Doha 231

जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।

5 verses

Doha 232

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।

5 verses

Doha 233

जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।

5 verses

Doha 234

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।

5 verses

Doha 235

सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।।

5 verses

Doha 236

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।

5 verses

Doha 237

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।।

5 verses

Doha 238

सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।।

5 verses

Doha 239

सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।।

5 verses

Doha 240

सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।।

5 verses

Doha 241

मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।।

5 verses

Doha 242

भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।

5 verses

Doha 243

सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।।

5 verses

Doha 244

आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।

5 verses

Doha 245

गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई।।

5 verses

Doha 246

सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।।

5 verses

Doha 247

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।।

5 verses

Doha 248

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।।

5 verses

Doha 249

राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।।

5 verses

Doha 250

कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।

5 verses

Doha 251

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।।

5 verses

Doha 252

पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।।

5 verses

Doha 253

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।।

5 verses

Doha 254

बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।।

5 verses

Doha 255

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।।

5 verses

Doha 256

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।

5 verses

Doha 257

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।

5 verses

Doha 258

आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।

5 verses

Doha 259

गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।

5 verses

Doha 260

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।

5 verses

Doha 261

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।

5 verses

Doha 262

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।

5 verses

Doha 263

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।।

5 verses

Doha 264

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।।

5 verses

Doha 265

सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।।

5 verses

Doha 266

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।।

5 verses

Doha 267

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।

5 verses

Doha 268

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।।

5 verses

Doha 269

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।

5 verses

Doha 270

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।

5 verses

Doha 271

कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।।

5 verses

Doha 272

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।।

5 verses

Doha 273

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।।

5 verses

Doha 274

सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।

5 verses

Doha 275

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।

5 verses

Doha 276

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।

5 verses

Doha 277

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।

5 verses

Doha 278

जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।।

5 verses

Doha 279

कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।।

5 verses

Doha 280

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।।

5 verses

Doha 281

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।।

5 verses

Doha 282

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।।

5 verses

Doha 283

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।।

5 verses

Doha 284

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।।

5 verses

Doha 285

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।।

5 verses

Doha 286

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।।

5 verses

Doha 287

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।।

5 verses

Doha 288

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।।

5 verses

Doha 289

अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।।

5 verses

Doha 290

राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।।

5 verses

Doha 291

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।

5 verses

Doha 292

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।

5 verses

Doha 293

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।

5 verses

Doha 294

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।।

5 verses

Doha 295

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।।

5 verses

Doha 296

करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।

5 verses

Doha 297

सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।

5 verses

Doha 298

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।।

5 verses

Doha 299

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।।

5 verses

Doha 300

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।।

5 verses

Doha 301

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।।

5 verses

Doha 302

कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।।

5 verses

Doha 303

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे।।

5 verses

Doha 304

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।।

5 verses

Doha 305

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।

5 verses

Doha 306

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।।

5 verses

Doha 307

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।।

5 verses

Doha 308

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।।

5 verses

Doha 309

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई।

5 verses

Doha 310

भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।।

5 verses

Doha 311

कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।।

5 verses

Doha 312

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।।

5 verses

Doha 313

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।

5 verses

Doha 314

पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।।

5 verses

Doha 315

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।।

5 verses

Doha 316

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।

5 verses

Doha 317

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।

5 verses

Doha 318

जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।

5 verses

Doha 319

सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।

5 verses

Doha 320

परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।।

5 verses

Doha 321

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।।

5 verses

Doha 322

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।।

5 verses

Doha 323

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।।

5 verses

Doha 324

राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।।

5 verses

Doha 325

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।।

5 verses

Doha 326

पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।

6 verses

Ayodhya Kanda — Valmiki Ramayana (Sanskrit)

The same Kand in Maharshi Valmiki's original Sanskrit, across 119 sargas with English translation.

Frequently asked about Ayodhya Kand

How many dohas are in Ayodhya Kand?

Ayodhya Kand (अयोध्याकाण्ड) of the Tulsidas Ramcharitmanas has 326 dohas, grouped into 327 sections containing 1633 individual verses in total — chaupais, dohas, sorathas and chhands.

What happens in Ayodhya Kand?

Ayodhya Kand narrates Kaikeyi's two boons, Shri Ram's fourteen-year exile with Sita and Lakshman, the grief and death of King Dasharath, and Bharat's journey to Chitrakoot to plead for Ram's return.

Which famous passages are in Ayodhya Kand?

Ayodhya Kand contains Ram Vanvas, Kevat Prasang, Dasharath Maran, and Bharat Milap. Each passage can be read verse by verse with its meaning and translation.

How many sargas are in Valmiki's Ayodhya Kanda?

Ayodhya Kanda (अयोध्याकाण्डम्) of the Valmiki Ramayana has 119 sargas of Sanskrit shlokas, each available here with an English translation.

Can I read Ayodhya Kand in Hindi and English?

Yes. Every verse of Ayodhya Kand on RamayanaPath shows the original Awadhi text in Devanagari, a Hindi meaning (अर्थ), an English translation, and IAST transliteration — free and without registration.