Ayodhya Kand
अयोध्याकाण्ड
326 Dohas
Doha 0
यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके
3 verses
Doha 1
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।
5 verses
Doha 2
एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।
5 verses
Doha 3
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।
5 verses
Doha 4
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।
5 verses
Doha 5
मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।
5 verses
Doha 6
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।
5 verses
Doha 7
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।
5 verses
Doha 8
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।
5 verses
Doha 9
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।
5 verses
Doha 10
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।
5 verses
Doha 11
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।
5 verses
Doha 12
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।
5 verses
Doha 13
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।
5 verses
Doha 14
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।
5 verses
Doha 15
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।
5 verses
Doha 16
एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।
5 verses
Doha 17
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।
5 verses
Doha 18
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।
5 verses
Doha 19
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।
5 verses
Doha 20
कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।
5 verses
Doha 21
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।
5 verses
Doha 22
कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।
5 verses
Doha 23
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।
5 verses
Doha 24
बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।
5 verses
Doha 25
कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।।
5 verses
Doha 26
अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।।
5 verses
Doha 27
पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।।
5 verses
Doha 28
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।
5 verses
Doha 29
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।
6 verses
Doha 30
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।
5 verses
Doha 31
आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।
5 verses
Doha 32
राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।।
5 verses
Doha 33
जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।
5 verses
Doha 34
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।
5 verses
Doha 35
ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।
5 verses
Doha 36
चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।
5 verses
Doha 37
राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।
5 verses
Doha 38
पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।
5 verses
Doha 39
आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।।
5 verses
Doha 40
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।
5 verses
Doha 41
निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।।
5 verses
Doha 42
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।
5 verses
Doha 43
रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।।
5 verses
Doha 44
अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।।
5 verses
Doha 45
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।
5 verses
Doha 46
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।
5 verses
Doha 47
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।
5 verses
Doha 48
का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।।
5 verses
Doha 49
एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।
5 verses
Doha 50
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।
4 verses
Doha 51
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।
5 verses
Doha 52
रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।।
5 verses
Doha 53
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।
5 verses
Doha 54
बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।।
5 verses
Doha 55
राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।
5 verses
Doha 56
जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।
5 verses
Doha 57
देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।।
5 verses
Doha 58
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।
5 verses
Doha 59
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।
5 verses
Doha 60
बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।।
5 verses
Doha 61
मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।।
5 verses
Doha 62
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।।
5 verses
Doha 63
नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।
5 verses
Doha 64
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।
5 verses
Doha 65
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।।
5 verses
Doha 66
बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।।
5 verses
Doha 67
मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।।
5 verses
Doha 68
अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।।
5 verses
Doha 69
लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।।
5 verses
Doha 70
समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।
5 verses
Doha 71
अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।
5 verses
Doha 72
दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।।
5 verses
Doha 73
मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।।
5 verses
Doha 74
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।।
5 verses
Doha 75
पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।
6 verses
Doha 76
गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।।
5 verses
Doha 77
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।।
5 verses
Doha 78
रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।।
5 verses
Doha 79
सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।।
5 verses
Doha 80
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।।
5 verses
Doha 81
एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।
5 verses
Doha 82
जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।।
5 verses
Doha 83
तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।।
5 verses
Doha 84
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।
5 verses
Doha 85
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।।
5 verses
Doha 86
जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।।
5 verses
Doha 87
सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।
5 verses
Doha 88
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।
5 verses
Doha 89
राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।।
5 verses
Doha 90
उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।
5 verses
Doha 91
बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।
5 verses
Doha 92
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।।
5 verses
Doha 93
अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।।
5 verses
Doha 94
सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू।।
5 verses
Doha 95
तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।
5 verses
Doha 96
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।
5 verses
Doha 97
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।।
5 verses
Doha 98
पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।
5 verses
Doha 99
प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।।
5 verses
Doha 100
जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।
5 verses
Doha 101
कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।।
5 verses
Doha 102
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।
5 verses
Doha 103
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।
5 verses
Doha 104
गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।।
5 verses
Doha 105
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।।
5 verses
Doha 106
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।
5 verses
Doha 107
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।।
5 verses
Doha 108
सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।।
5 verses
Doha 109
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।
5 verses
Doha 110
सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।।
5 verses
Doha 111
राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।।
5 verses
Doha 112
पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।।
5 verses
Doha 113
जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।।
5 verses
Doha 114
सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।
5 verses
Doha 115
एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।।
5 verses
Doha 116
बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।।
5 verses
Doha 117
कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।।
5 verses
Doha 118
पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।।
5 verses
Doha 119
फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।।
4 verses
Doha 120
जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।।
5 verses
Doha 121
नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।।
5 verses
Doha 122
गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।।
5 verses
Doha 123
आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।।
5 verses
Doha 124
अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।।
5 verses
Doha 125
मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।
5 verses
Doha 126
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।।
5 verses
Doha 127
जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।
5 verses
Doha 128
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।।
5 verses
Doha 129
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।।
4 verses
Doha 130
काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।
5 verses
Doha 131
अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।।
5 verses
Doha 132
एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।।
5 verses
Doha 133
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।।
5 verses
Doha 134
अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।।
5 verses
Doha 135
यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।।
5 verses
Doha 136
धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।।
5 verses
Doha 137
रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।
5 verses
Doha 138
केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।।
5 verses
Doha 139
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।
5 verses
Doha 140
राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।।
5 verses
Doha 141
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।।
5 verses
Doha 142
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।।
5 verses
Doha 143
धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।।
5 verses
Doha 144
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।।
5 verses
Doha 145
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।।
5 verses
Doha 146
पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।।
5 verses
Doha 147
एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।
5 verses
Doha 148
अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।।
5 verses
Doha 149
भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।।
5 verses
Doha 150
पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।
5 verses
Doha 151
केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।।
5 verses
Doha 152
पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।।
5 verses
Doha 153
तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।।
5 verses
Doha 154
प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।।
5 verses
Doha 155
धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।
5 verses
Doha 156
जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।।
5 verses
Doha 157
तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।।
5 verses
Doha 158
चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।
5 verses
Doha 159
हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।।
5 verses
Doha 160
तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।।
5 verses
Doha 161
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।
5 verses
Doha 162
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।।
5 verses
Doha 163
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।
5 verses
Doha 164
भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।
5 verses
Doha 165
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।
5 verses
Doha 166
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।।
5 verses
Doha 167
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।
5 verses
Doha 168
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।
5 verses
Doha 169
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।
5 verses
Doha 170
नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।।
5 verses
Doha 171
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।
5 verses
Doha 172
अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।
5 verses
Doha 173
बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।
5 verses
Doha 174
सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।
5 verses
Doha 175
अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।
5 verses
Doha 176
कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।
5 verses
Doha 177
मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।।
5 verses
Doha 178
हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।
5 verses
Doha 179
कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।।
5 verses
Doha 180
कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।।
5 verses
Doha 181
कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।।
5 verses
Doha 182
गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।।
5 verses
Doha 183
आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।।
5 verses
Doha 184
भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।।
5 verses
Doha 185
भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।।
5 verses
Doha 186
घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।।
5 verses
Doha 187
चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।।
5 verses
Doha 188
राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।।
5 verses
Doha 189
सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।।
5 verses
Doha 190
होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।।
5 verses
Doha 191
बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।
5 verses
Doha 192
राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।।
5 verses
Doha 193
लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।
5 verses
Doha 194
भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।।
5 verses
Doha 195
नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।।
5 verses
Doha 196
कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।
5 verses
Doha 197
सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।।
5 verses
Doha 198
जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।।
5 verses
Doha 199
कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।।
5 verses
Doha 200
लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।।
5 verses
Doha 201
राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ।।
5 verses
Doha 202
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।।
6 verses
Doha 203
कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।।
5 verses
Doha 204
झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।।
5 verses
Doha 205
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।
5 verses
Doha 206
प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।।
5 verses
Doha 207
यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।।
5 verses
Doha 208
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।।
5 verses
Doha 209
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।
5 verses
Doha 210
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।।
5 verses
Doha 211
मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।।
5 verses
Doha 212
एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।।
5 verses
Doha 213
सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।।
5 verses
Doha 214
रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।।
5 verses
Doha 215
मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।।
5 verses
Doha 216
कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।।
5 verses
Doha 217
जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।।
5 verses
Doha 218
बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने।।
5 verses
Doha 219
सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।।
5 verses
Doha 220
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी।।
5 verses
Doha 221
जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू।।
5 verses
Doha 222
कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं।।
5 verses
Doha 223
भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।।
5 verses
Doha 224
निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।
5 verses
Doha 225
मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।।
5 verses
Doha 226
सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।।
4 verses
Doha 227
बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।।
5 verses
Doha 228
बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।
5 verses
Doha 229
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।
5 verses
Doha 230
उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।
5 verses
Doha 231
जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।
5 verses
Doha 232
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।
5 verses
Doha 233
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
5 verses
Doha 234
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।
5 verses
Doha 235
सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।।
5 verses
Doha 236
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।
5 verses
Doha 237
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।।
5 verses
Doha 238
सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।।
5 verses
Doha 239
सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।।
5 verses
Doha 240
सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।।
5 verses
Doha 241
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।।
5 verses
Doha 242
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।
5 verses
Doha 243
सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।।
5 verses
Doha 244
आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।
5 verses
Doha 245
गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई।।
5 verses
Doha 246
सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।।
5 verses
Doha 247
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।।
5 verses
Doha 248
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।।
5 verses
Doha 249
राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।।
5 verses
Doha 250
कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।
5 verses
Doha 251
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।।
5 verses
Doha 252
पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।।
5 verses
Doha 253
कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।।
5 verses
Doha 254
बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।।
5 verses
Doha 255
सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।।
5 verses
Doha 256
तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।
5 verses
Doha 257
भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।
5 verses
Doha 258
आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।
5 verses
Doha 259
गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।
5 verses
Doha 260
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।
5 verses
Doha 261
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।
5 verses
Doha 262
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।
5 verses
Doha 263
सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।।
5 verses
Doha 264
कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।।
5 verses
Doha 265
सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।।
5 verses
Doha 266
सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।।
5 verses
Doha 267
कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।
5 verses
Doha 268
लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।।
5 verses
Doha 269
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।
5 verses
Doha 270
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
5 verses
Doha 271
कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।।
5 verses
Doha 272
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।।
5 verses
Doha 273
गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।।
5 verses
Doha 274
सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।
5 verses
Doha 275
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।
5 verses
Doha 276
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।
5 verses
Doha 277
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।
5 verses
Doha 278
जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।।
5 verses
Doha 279
कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।।
5 verses
Doha 280
एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।।
5 verses
Doha 281
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।।
5 verses
Doha 282
सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।।
5 verses
Doha 283
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।।
5 verses
Doha 284
रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।।
5 verses
Doha 285
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।।
5 verses
Doha 286
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।।
5 verses
Doha 287
तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।।
5 verses
Doha 288
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।।
5 verses
Doha 289
अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।।
5 verses
Doha 290
राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।।
5 verses
Doha 291
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।
5 verses
Doha 292
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।
5 verses
Doha 293
सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।
5 verses
Doha 294
भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।।
5 verses
Doha 295
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।।
5 verses
Doha 296
करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।
5 verses
Doha 297
सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।
5 verses
Doha 298
प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।।
5 verses
Doha 299
राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।।
5 verses
Doha 300
सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।।
5 verses
Doha 301
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।।
5 verses
Doha 302
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।।
5 verses
Doha 303
कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे।।
5 verses
Doha 304
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।।
5 verses
Doha 305
जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।
5 verses
Doha 306
सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।।
5 verses
Doha 307
सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।।
5 verses
Doha 308
एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।।
5 verses
Doha 309
धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई।
5 verses
Doha 310
भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।।
5 verses
Doha 311
कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।।
5 verses
Doha 312
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।।
5 verses
Doha 313
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।
5 verses
Doha 314
पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।।
5 verses
Doha 315
तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।।
5 verses
Doha 316
राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।
5 verses
Doha 317
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।
5 verses
Doha 318
जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।
5 verses
Doha 319
सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।
5 verses
Doha 320
परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।।
5 verses
Doha 321
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।।
5 verses
Doha 322
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।।
5 verses
Doha 323
सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।।
5 verses
Doha 324
राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।।
5 verses
Doha 325
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।।
5 verses
Doha 326
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।
6 verses