Bal Kand

बालकाण्ड

361 Dohas

Doha 0

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

7 verses

Doha 1

बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।

5 verses

Doha 2

गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।

8 verses

Doha 3

मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।।

8 verses

Doha 4

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ।।

7 verses

Doha 5

मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।।

6 verses

Doha 6

खल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।।

6 verses

Doha 7

अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता।।

10 verses

Doha 8

आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।।

8 verses

Doha 9

खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा।।

7 verses

Doha 10

एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा।।

8 verses

Doha 11

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।

6 verses

Doha 12

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।

7 verses

Doha 13

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।।

6 verses

Doha 14

एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।।

13 verses

Doha 15

पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।।

7 verses

Doha 16

बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।।

5 verses

Doha 17

प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।।

6 verses

Doha 18

कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।।

6 verses

Doha 19

बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।

5 verses

Doha 20

आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।।

5 verses

Doha 21

समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।।

5 verses

Doha 22

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।।

5 verses

Doha 23

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।।

5 verses

Doha 24

राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।।

5 verses

Doha 25

राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ।।

5 verses

Doha 26

नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।।

5 verses

Doha 27

चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।।

5 verses

Doha 28

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।।

8 verses

Doha 29

अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी।।

7 verses

Doha 30

जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई।।

6 verses

Doha 31

तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।।

8 verses

Doha 32

राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।।

9 verses

Doha 33

कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी।।

5 verses

Doha 34

एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।।

5 verses

Doha 35

दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना।।

8 verses

Doha 36

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी।।

6 verses

Doha 37

सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना।।

9 verses

Doha 38

जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।।

6 verses

Doha 39

जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई।।

8 verses

Doha 40

रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई।।

5 verses

Doha 41

सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई।।

5 verses

Doha 42

कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी।।

5 verses

Doha 43

आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी।।

6 verses

Doha 44

भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।।

5 verses

Doha 45

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।।

5 verses

Doha 46

अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू।।

5 verses

Doha 47

जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी।।

5 verses

Doha 48

एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।।

6 verses

Doha 49

रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा।।

5 verses

Doha 50

संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरपु बिसेषा।।

5 verses

Doha 51

बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी।।

6 verses

Doha 52

जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू।।

5 verses

Doha 53

लछिमन दीख उमाकृत बेषा चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा।।

5 verses

Doha 54

मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना।।

5 verses

Doha 55

देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते।।

5 verses

Doha 56

सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।।

5 verses

Doha 57

तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा।।

5 verses

Doha 58

हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी।।

5 verses

Doha 59

नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।।

5 verses

Doha 60

एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी।।

5 verses

Doha 61

किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा।।

5 verses

Doha 62

कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा।।

5 verses

Doha 63

पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी।।

5 verses

Doha 64

सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा।।

5 verses

Doha 65

समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए।।

5 verses

Doha 66

सरिता सब पुनित जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं।।

5 verses

Doha 67

कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी।।

5 verses

Doha 68

सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी।।

5 verses

Doha 69

तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई।।

5 verses

Doha 70

सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।।

5 verses

Doha 71

कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ।।

5 verses

Doha 72

अब जौ तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू।।

5 verses

Doha 73

करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी।।

5 verses

Doha 74

उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना।।

5 verses

Doha 75

अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भउ अनेक धीर मुनि ग्यानी।।

5 verses

Doha 76

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना।।

5 verses

Doha 77

कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं।।

5 verses

Doha 78

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी।।

5 verses

Doha 79

दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई।।

5 verses

Doha 80

अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा।।

5 verses

Doha 81

जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा।।

5 verses

Doha 82

जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।।

5 verses

Doha 83

मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई।।

5 verses

Doha 84

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा।।

6 verses

Doha 85

सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा।।

6 verses

Doha 86

उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ।।

6 verses

Doha 87

देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा।।

6 verses

Doha 88

जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा।।

5 verses

Doha 89

यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन।

5 verses

Doha 90

सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी।।

5 verses

Doha 91

सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा।।

5 verses

Doha 92

सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।।

5 verses

Doha 93

बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई।।

6 verses

Doha 94

जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।।

6 verses

Doha 95

नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई।।

6 verses

Doha 96

लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए।।

6 verses

Doha 97

नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।।

6 verses

Doha 98

तब नारद सबहि समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा।।

6 verses

Doha 99

तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे।।

6 verses

Doha 100

बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे।।

6 verses

Doha 101

जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।।

6 verses

Doha 102

बहु बिधि संभु सास समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई।।

6 verses

Doha 103

तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई।।

6 verses

Doha 104

संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा।।

5 verses

Doha 105

मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला।।

5 verses

Doha 106

हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं।।

5 verses

Doha 107

बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें।।

5 verses

Doha 108

जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।।

5 verses

Doha 109

जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ।।

5 verses

Doha 110

जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।।

5 verses

Doha 111

पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी।।

5 verses

Doha 112

झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें।।

5 verses

Doha 113

तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई।।

5 verses

Doha 114

रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उडावनिहारी।।

5 verses

Doha 115

अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकर मन लागी।।

5 verses

Doha 116

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।।

5 verses

Doha 117

निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी।।

5 verses

Doha 118

एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई।।

5 verses

Doha 119

कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।

5 verses

Doha 120

ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी।।

8 verses

Doha 121

सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए।।

5 verses

Doha 122

सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।।

5 verses

Doha 123

मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।।

5 verses

Doha 124

तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।।

6 verses

Doha 125

हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।।

5 verses

Doha 126

तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।।

5 verses

Doha 127

भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।।

5 verses

Doha 128

राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।।

5 verses

Doha 129

सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके।।

5 verses

Doha 130

बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।।

5 verses

Doha 131

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी।।

5 verses

Doha 132

हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई।।

5 verses

Doha 133

कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।।

5 verses

Doha 134

जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।।

5 verses

Doha 135

जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि देहि न बिलोकी भूली।।

5 verses

Doha 136

पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा।।

5 verses

Doha 137

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई।।

5 verses

Doha 138

जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।

5 verses

Doha 139

हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी।।

5 verses

Doha 140

एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे।।

5 verses

Doha 141

अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी।।

5 verses

Doha 142

स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।।

5 verses

Doha 143

बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा।।

5 verses

Doha 144

करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।।

5 verses

Doha 145

बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ।।

5 verses

Doha 146

सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।।

5 verses

Doha 147

सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा।।

5 verses

Doha 148

पद राजीव बरनि नहि जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं।।

5 verses

Doha 149

सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी।।

5 verses

Doha 150

देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले।।

5 verses

Doha 151

सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।।

5 verses

Doha 152

इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे।।

5 verses

Doha 153

सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी।।

5 verses

Doha 154

नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना।।

5 verses

Doha 155

भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई।।

5 verses

Doha 156

हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना।।

5 verses

Doha 157

आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी।।

5 verses

Doha 158

फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा।।

5 verses

Doha 159

गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ।।

6 verses

Doha 160

भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा।।

5 verses

Doha 161

कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना।।

6 verses

Doha 162

तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।।

5 verses

Doha 163

जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं।।

5 verses

Doha 164

नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा।।

5 verses

Doha 165

कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ।।

5 verses

Doha 166

तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा।।

5 verses

Doha 167

सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं।।

5 verses

Doha 168

जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना।।

5 verses

Doha 169

एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें।।

5 verses

Doha 170

सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी।।

5 verses

Doha 171

तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी।।

5 verses

Doha 172

आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा।।

5 verses

Doha 173

उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई।।

5 verses

Doha 174

छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई।।

5 verses

Doha 175

अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए।।

5 verses

Doha 176

काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा।।

5 verses

Doha 177

कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई।।

5 verses

Doha 178

तिन्हि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए।।

6 verses

Doha 179

रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे।।

5 verses

Doha 180

सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।।

5 verses

Doha 181

कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया।।

5 verses

Doha 182

मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा।।

9 verses

Doha 183

इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।।

6 verses

Doha 184

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।।

6 verses

Doha 185

बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।।

5 verses

Doha 186

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।

5 verses

Doha 187

जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।।

6 verses

Doha 188

गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा ।

5 verses

Doha 189

एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।।

5 verses

Doha 190

तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आई।।

5 verses

Doha 191

नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।

5 verses

Doha 192

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।

5 verses

Doha 193

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आई सब रानी।।

5 verses

Doha 194

ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा।।

5 verses

Doha 195

कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ।।

5 verses

Doha 196

यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत गुनगाना।।

5 verses

Doha 197

कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती।।

5 verses

Doha 198

धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी।।

5 verses

Doha 199

काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा।।

7 verses

Doha 200

एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता।।

5 verses

Doha 201

एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।।

5 verses

Doha 202

अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।।

5 verses

Doha 203

बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा।।

6 verses

Doha 204

बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए।।

5 verses

Doha 205

बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई।।

5 verses

Doha 206

यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई।।

5 verses

Doha 207

मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयऊ लै बिप्र समाजा।।

6 verses

Doha 208

सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी।।

7 verses

Doha 209

अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला।।

5 verses

Doha 210

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।।

7 verses

Doha 211

परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।

5 verses

Doha 212

चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा।।

5 verses

Doha 213

बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई।।

5 verses

Doha 214

सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा।।

5 verses

Doha 215

कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा।।

5 verses

Doha 216

कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।।

5 verses

Doha 217

मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ।।

5 verses

Doha 218

लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।।

5 verses

Doha 219

मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता।।

5 verses

Doha 220

देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए।।

5 verses

Doha 221

कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी।।

5 verses

Doha 222

देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई।।

5 verses

Doha 223

बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबहीं का।।

5 verses

Doha 224

पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई।।

5 verses

Doha 225

सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने।।

5 verses

Doha 226

निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा।।

5 verses

Doha 227

सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए।।

5 verses

Doha 228

चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन।।

5 verses

Doha 229

देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए।।

5 verses

Doha 230

कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि।।

5 verses

Doha 231

तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई।।

5 verses

Doha 232

चितवहि चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता।।

5 verses

Doha 233

सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा।।

5 verses

Doha 234

धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी।।

5 verses

Doha 235

जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति।।

5 verses

Doha 236

सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी।।

6 verses

Doha 237

हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई।।

5 verses

Doha 238

घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई।।

5 verses

Doha 239

नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी।।

6 verses

Doha 240

सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।।

5 verses

Doha 241

राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।।

5 verses

Doha 242

बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा।।

5 verses

Doha 243

सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।।

5 verses

Doha 244

कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे।।

5 verses

Doha 245

प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।।

5 verses

Doha 246

ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।।

5 verses

Doha 247

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी।।

5 verses

Doha 248

चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।।

5 verses

Doha 249

राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।।

5 verses

Doha 250

नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।।

5 verses

Doha 251

भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा।।

5 verses

Doha 252

कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा।।

5 verses

Doha 253

रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई।।

5 verses

Doha 254

लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले।।

5 verses

Doha 255

नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी।।

5 verses

Doha 256

सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेठ कहावत हितू हमारे।।

5 verses

Doha 257

काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे।।

5 verses

Doha 258

नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।।

5 verses

Doha 259

गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी।।

5 verses

Doha 260

दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।।

5 verses

Doha 261

देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।।

6 verses

Doha 262

प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।।

5 verses

Doha 263

झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई।।

5 verses

Doha 264

सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।।

5 verses

Doha 265

पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।।

5 verses

Doha 266

तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे।।

5 verses

Doha 267

बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू।।

5 verses

Doha 268

खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।।

5 verses

Doha 269

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।।

5 verses

Doha 270

समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।।

5 verses

Doha 271

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।

5 verses

Doha 272

लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।

5 verses

Doha 273

बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी।।

5 verses

Doha 274

कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु।।

5 verses

Doha 275

तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।।

5 verses

Doha 276

कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।

5 verses

Doha 277

नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।

5 verses

Doha 278

मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।।

5 verses

Doha 279

अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।।

5 verses

Doha 280

बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।।

5 verses

Doha 281

बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें।।

5 verses

Doha 282

देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी।।

5 verses

Doha 283

निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही।।

5 verses

Doha 284

देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना।।

5 verses

Doha 285

जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु।।

5 verses

Doha 286

अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे।।

5 verses

Doha 287

दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई।।

5 verses

Doha 288

बेनि हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे।।

5 verses

Doha 289

रचे रुचिर बर बंदनिबारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे।।

5 verses

Doha 290

पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन।।

5 verses

Doha 291

सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता।।

5 verses

Doha 292

पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे।।

5 verses

Doha 293

सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए।।

5 verses

Doha 294

सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई।।

5 verses

Doha 295

राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।।

5 verses

Doha 296

कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना।।

5 verses

Doha 297

जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि।।

5 verses

Doha 298

भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई।।

5 verses

Doha 299

बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े।।

5 verses

Doha 300

कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं।।

5 verses

Doha 301

गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।।

5 verses

Doha 302

सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें।।

5 verses

Doha 303

बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता।।

5 verses

Doha 304

मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें।।

5 verses

Doha 305

कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा।।

5 verses

Doha 306

बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं।।

5 verses

Doha 307

निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती।।

5 verses

Doha 308

मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा।।

5 verses

Doha 309

रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी।।

5 verses

Doha 310

जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही।।

5 verses

Doha 311

बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई।।

6 verses

Doha 312

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं।।

5 verses

Doha 313

उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा।।

5 verses

Doha 314

सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना।।

5 verses

Doha 315

जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं।।

5 verses

Doha 316

केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा।।

6 verses

Doha 317

जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा।।

6 verses

Doha 318

बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।।

6 verses

Doha 319

नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी।।

6 verses

Doha 320

मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं।।

6 verses

Doha 321

बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।।

6 verses

Doha 322

समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए।।

6 verses

Doha 323

सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई।।

7 verses

Doha 324

जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी।।

9 verses

Doha 325

कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।।नयन लाभु सब सादर लेहीं।।

10 verses

Doha 326

जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।।

9 verses

Doha 327

स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन।।

10 verses

Doha 328

पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती।।

5 verses

Doha 329

पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।।

5 verses

Doha 330

नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।

5 verses

Doha 331

दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।।

5 verses

Doha 332

जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती।।

5 verses

Doha 333

पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।।

5 verses

Doha 334

सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई।।

5 verses

Doha 335

चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।।

5 verses

Doha 336

देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं।।

6 verses

Doha 337

अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।।

5 verses

Doha 338

सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।।

5 verses

Doha 339

बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई।।

5 verses

Doha 340

नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे।।

5 verses

Doha 341

मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा।।

5 verses

Doha 342

सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।।

5 verses

Doha 343

बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई।।

5 verses

Doha 344

हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे।।

5 verses

Doha 345

भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।।

5 verses

Doha 346

मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।।

5 verses

Doha 347

धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ।।

5 verses

Doha 348

मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर।।

5 verses

Doha 349

करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।।

5 verses

Doha 350

चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।।

6 verses

Doha 351

देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।।

5 verses

Doha 352

जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।।

5 verses

Doha 353

बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें।।

5 verses

Doha 354

सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू।।

5 verses

Doha 355

मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि।।

5 verses

Doha 356

भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए।।

5 verses

Doha 357

मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।।

5 verses

Doha 358

नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना।।

5 verses

Doha 359

भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई।।

5 verses

Doha 360

सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।।

6 verses

Doha 361

बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।।

6 verses