Bal Kand
Doha 211
5 verses
Chhand1 of 5
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही।।
अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।।
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पावन (पवित्र) पद (चरण) का स्पर्श — शोक-नाशक — (उससे) तप-पुंज (तपस्विनी अहल्या) सचमुच प्रकट हुई। रघुनायक को देखते — जन-सुखदायक — सन्मुख होकर हाथ जोड़कर रही। अत्यन्त प्रेम से अधीर — पुलकित शरीर — मुख से वचन नहीं आता। अतिशय बड़भागी (भाग्यशाली) — चरणों लगी — दोनों नयनों से जलधार बही। धीरज मन में किया — प्रभु को पहचाना — रघुपति-कृपा से भक्ति पाई। अत्यन्त निर्मल वाणी से स्तुति ठानी (की) — (कहा) ज्ञानगम्य (ज्ञान से जानने योग्य)! जय रघुराई! (कहा) मैं नारी — अपावन (अपवित्र)। प्रभु — जग-पावन (जगत को पवित्र करने वाले), रावण-रिपु, जन-सुखदाई। राजीव-लोचन (कमल-नेत्र)! भव-भय-मोचन (संसार-भय-मुक्तिदाता)! पाहि-पाहि (रक्षा करो)! शरण आई। मुनि (गौतम) ने जो शाप दिया — अत्यन्त भला किया — परम अनुग्रह (कृपा) मैंने माना। नेत्र भरकर हरि — भवमोचन (संसार से मुक्ति देने वाले) — देखा — यही लाभ शंकर (शिव) ने जाना। प्रभु! मेरी विनती — मैं मति-भोरी (मूढ़-बुद्धि) — नाथ! आन (और कोई) वर नहीं माँगती। पद-कमल-परागा (चरण-कमल-रज) के रस (प्रेम) में अनुरागी (लीन) — मेरा मन-मधुप (मन-रूपी भ्रमर) पान (रसपान) करे। जिस पद (चरण) से सुरसरिता (गंगा) — परम पुनीत (पवित्र) — प्रकट हुई, शिव ने शीश (सिर) पर धरी। वही पद-पंकज (चरण-कमल) — जिन्हें अज (ब्रह्मा) पूजते — कृपालु हरि ने मेरे सिर पर धरा। इस भाँति गौतम-नारी (अहल्या) सिधारीं (चलीं) — बार-बार हरि-चरण पर गिरकर। जो अत्यन्त मन भाया — वह वर पाया — पतिलोक (पति के लोक) में आनन्द-भरी गईं।
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At the touch of His holy feet, destroyer of sorrow, Ahalya — a mass of accumulated austerity — was restored to her true form. Beholding the Lord of the Raghus, giver of joy to His devotees, she stood facing Him with folded hands. Overwhelmed with love, her body thrilling, no words would come from her mouth. Supremely blessed, she fell at His feet as streams of tears flowed from both eyes. Steadying herself, she began to offer praise...
Chhand2 of 5
धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई।।
मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।।
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Chhand3 of 5
मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना।।
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।।
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Chhand4 of 5
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।।
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी।।
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Doha5 of 5
अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।
तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल।।211।।
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ऐसे प्रभु — दीनबन्धु, हरि — कारण-रहित (निष्कारण) दयालु। तुलसीदास! सठ (मूर्ख)! उन्हें भजो — छोड़कर कपट-जंजाल (छल का जाल)।
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Such is the Lord — friend of the lowly, Hari, compassionate without cause. Tulsidas says: O foolish one, worship Him and abandon the web of deceit!