Aranya Kand

अरण्यकाण्ड

46 Dohas

Doha 0

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं

2 verses

Doha 1

पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।

5 verses

Doha 2

प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।

8 verses

Doha 3

रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।।

5 verses

Doha 4

नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।

6 verses

Doha 5

अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।

12 verses

Doha 6

सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।।

8 verses

Doha 7

मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।।

5 verses

Doha 8

कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।।

5 verses

Doha 9

अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।।

5 verses

Doha 10

मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।।

13 verses

Doha 11

कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।।

15 verses

Doha 12

एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।।

8 verses

Doha 13

तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।।

10 verses

Doha 14

जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।।

5 verses

Doha 15

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।।

5 verses

Doha 16

धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।।

7 verses

Doha 17

भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।।

11 verses

Doha 18

नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।।

7 verses

Doha 19

प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।।

7 verses

Doha 20

तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।

8 verses

Doha 21

जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।।

10 verses

Doha 22

सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।।

7 verses

Doha 23

सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।

5 verses

Doha 24

सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।।

5 verses

Doha 25

दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें।।

5 verses

Doha 26

जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।

4 verses

Doha 27

तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।

10 verses

Doha 28

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।।

9 verses

Doha 29

हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।।

15 verses

Doha 30

रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।।

10 verses

Doha 31

तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।।

6 verses

Doha 32

गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।।

1 verse

Doha 33

कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।।

5 verses

Doha 34

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।

6 verses

Doha 35

पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।

5 verses

Doha 36

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

7 verses

Doha 37

चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।।

7 verses

Doha 38

बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।।

8 verses

Doha 39

गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।।

6 verses

Doha 40

बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।।

6 verses

Doha 41

देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।।

7 verses

Doha 42

सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।।

6 verses

Doha 43

अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।।

6 verses

Doha 44

सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।

5 verses

Doha 45

सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।।

6 verses

Doha 46

निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।

4 verses