बालकाण्ड
श्रीरामचरितमानस — हिन्दी अर्थ और अंग्रेज़ी अनुवाद सहित
361 दोहे · 1951 पद
बालकाण्ड में श्रीरामचरितमानस का मंगलाचरण, शिव-सती तथा शिव-पार्वती प्रसंग, श्रीराम एवं उनके भाइयों का जन्म और बाल्यकाल, सीता स्वयंवर में शिव धनुष का भंग और श्रीराम-सीता विवाह का वर्णन है।
Mangalacharan
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
Doha 1
बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
Doha 2
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।
Doha 3
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।।
Doha 4
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ।।
Doha 5
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।।
Doha 6
खल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।।
Doha 7
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता।।
Doha 8
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।।
Doha 9
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा।।
Doha 10
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा।।
Doha 11
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।
Doha 12
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।
Doha 13
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।।
Doha 14
एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।।
Doha 15
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।।
Doha 16
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।।
Doha 17
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।।
Doha 18
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।।
Doha 19
बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।
Doha 20
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।।
Doha 21
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।।
Doha 22
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।।
Doha 23
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।।
Doha 24
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।।
Doha 25
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ।।
Doha 26
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।।
Doha 27
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।।
Doha 28
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।।
Doha 29
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी।।
Doha 30
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई।।
Doha 31
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।।
Doha 32
राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।।
Doha 33
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी।।
Doha 34
एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।।
Doha 35
दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना।।
Doha 36
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी।।
Doha 37
सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना।।
Doha 38
जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।।
Doha 39
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई।।
Doha 40
रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई।।
Doha 41
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई।।
Doha 42
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी।।
Doha 43
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी।।
Doha 44
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।।
Doha 45
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।।
Doha 46
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू।।
Doha 47
जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी।।
Doha 48
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।।
Doha 49
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा।।
Doha 50
संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरपु बिसेषा।।
Doha 51
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी।।
Doha 52
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू।।
Doha 53
लछिमन दीख उमाकृत बेषा चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा।।
Doha 54
मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना।।
Doha 55
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते।।
Doha 56
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।।
Doha 57
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा।।
Doha 58
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी।।
Doha 59
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।।
Doha 60
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी।।
Doha 61
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा।।
Doha 62
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा।।
Doha 63
पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी।।
Doha 64
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा।।
Doha 65
समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए।।
Doha 66
सरिता सब पुनित जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं।।
Doha 67
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी।।
Doha 68
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी।।
Doha 69
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई।।
Doha 70
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।।
Doha 71
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ।।
Doha 72
अब जौ तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू।।
Doha 73
करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी।।
Doha 74
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना।।
Doha 75
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भउ अनेक धीर मुनि ग्यानी।।
Doha 76
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना।।
Doha 77
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं।।
Doha 78
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी।।
Doha 79
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई।।
Doha 80
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा।।
Doha 81
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा।।
Doha 82
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।।
Doha 83
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई।।
Doha 84
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा।।
Doha 85
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा।।
Doha 86
उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ।।
Doha 87
देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा।।
Doha 88
जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा।।
Doha 89
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन।
Doha 90
सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी।।
Doha 91
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा।।
Doha 92
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।।
Doha 93
बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई।।
Doha 94
जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।।
Doha 95
नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई।।
Doha 96
लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए।।
Doha 97
नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।।
Doha 98
तब नारद सबहि समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा।।
Doha 99
तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे।।
Doha 100
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे।।
Doha 101
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।।
Doha 102
बहु बिधि संभु सास समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई।।
Doha 103
तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई।।
Doha 104
संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा।।
Doha 105
मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला।।
Doha 106
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं।।
Doha 107
बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें।।
Doha 108
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।।
Doha 109
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ।।
Doha 110
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।।
Doha 111
पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी।।
Doha 112
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें।।
Doha 113
तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई।।
Doha 114
रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उडावनिहारी।।
Doha 115
अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकर मन लागी।।
Doha 116
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।।
Doha 117
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी।।
Doha 118
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई।।
Doha 119
कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।
Doha 120
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी।।
Doha 121
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए।।
Doha 122
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।।
Doha 123
मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।।
Doha 124
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।।
Doha 125
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।।
Doha 126
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।।
Doha 127
भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।।
Doha 128
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।।
Doha 129
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके।।
Doha 130
बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।।
Doha 131
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी।।
Doha 132
हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई।।
Doha 133
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।।
Doha 134
जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।।
Doha 135
जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि देहि न बिलोकी भूली।।
Doha 136
पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा।।
Doha 137
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई।।
Doha 138
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।
Doha 139
हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी।।
Doha 140
एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे।।
Doha 141
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी।।
Doha 142
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।।
Doha 143
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा।।
Doha 144
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।।
Doha 145
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ।।
Doha 146
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।।
Doha 147
सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा।।
Doha 148
पद राजीव बरनि नहि जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं।।
Doha 149
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी।।
Doha 150
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले।।
Doha 151
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।।
Doha 152
इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे।।
Doha 153
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी।।
Doha 154
नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना।।
Doha 155
भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई।।
Doha 156
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना।।
Doha 157
आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी।।
Doha 158
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा।।
Doha 159
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ।।
Doha 160
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा।।
Doha 161
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना।।
Doha 162
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।।
Doha 163
जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं।।
Doha 164
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा।।
Doha 165
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ।।
Doha 166
तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा।।
Doha 167
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं।।
Doha 168
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना।।
Doha 169
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें।।
Doha 170
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी।।
Doha 171
तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी।।
Doha 172
आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा।।
Doha 173
उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई।।
Doha 174
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई।।
Doha 175
अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए।।
Doha 176
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा।।
Doha 177
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई।।
Doha 178
तिन्हि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए।।
Doha 179
रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे।।
Doha 180
सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।।
Doha 181
कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया।।
Doha 182
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा।।
Doha 183
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।।
Doha 184
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।।
Doha 185
बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।।
Doha 186
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
Doha 187
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।।
Doha 188
गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा ।
Doha 189
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।।
Doha 190
तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आई।।
Doha 191
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।
Doha 192
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
Doha 193
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आई सब रानी।।
Doha 194
ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा।।
Doha 195
कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ।।
Doha 196
यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत गुनगाना।।
Doha 197
कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती।।
Doha 198
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी।।
Doha 199
काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा।।
Doha 200
एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता।।
Doha 201
एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।।
Doha 202
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।।
Doha 203
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा।।
Doha 204
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए।।
Doha 205
बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई।।
Doha 206
यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई।।
Doha 207
मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयऊ लै बिप्र समाजा।।
Doha 208
सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी।।
Doha 209
अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला।।
Doha 210
प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।।
Doha 211
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
Doha 212
चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा।।
Doha 213
बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई।।
Doha 214
सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा।।
Doha 215
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा।।
Doha 216
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।।
Doha 217
मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ।।
Doha 218
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।।
Doha 219
मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता।।
Doha 220
देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए।।
Doha 221
कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी।।
Doha 222
देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई।।
Doha 223
बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबहीं का।।
Doha 224
पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई।।
Doha 225
सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने।।
Doha 226
निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा।।
Doha 227
सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए।।
Doha 228
चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन।।
Doha 229
देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए।।
Doha 230
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि।।
Doha 231
तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई।।
Doha 232
चितवहि चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता।।
Doha 233
सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा।।
Doha 234
धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी।।
Doha 235
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति।।
Doha 236
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी।।
Doha 237
हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई।।
Doha 238
घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई।।
Doha 239
नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी।।
Doha 240
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।।
Doha 241
राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।।
Doha 242
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा।।
Doha 243
सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।।
Doha 244
कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे।।
Doha 245
प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।।
Doha 246
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।।
Doha 247
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी।।
Doha 248
चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।।
Doha 249
राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।।
Doha 250
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।।
Doha 251
भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा।।
Doha 252
कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा।।
Doha 253
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई।।
Doha 254
लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले।।
Doha 255
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी।।
Doha 256
सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेठ कहावत हितू हमारे।।
Doha 257
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे।।
Doha 258
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।।
Doha 259
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी।।
Doha 260
दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।।
Doha 261
देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।।
Doha 262
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।।
Doha 263
झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई।।
Doha 264
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।।
Doha 265
पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।।
Doha 266
तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे।।
Doha 267
बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू।।
Doha 268
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।।
Doha 269
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।।
Doha 270
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।।
Doha 271
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
Doha 272
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।
Doha 273
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी।।
Doha 274
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु।।
Doha 275
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।।
Doha 276
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।
Doha 277
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।
Doha 278
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।।
Doha 279
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।।
Doha 280
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।।
Doha 281
बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें।।
Doha 282
देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी।।
Doha 283
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही।।
Doha 284
देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना।।
Doha 285
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु।।
Doha 286
अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे।।
Doha 287
दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई।।
Doha 288
बेनि हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे।।
Doha 289
रचे रुचिर बर बंदनिबारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे।।
Doha 290
पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन।।
Doha 291
सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता।।
Doha 292
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे।।
Doha 293
सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए।।
Doha 294
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई।।
Doha 295
राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।।
Doha 296
कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना।।
Doha 297
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि।।
Doha 298
भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई।।
Doha 299
बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े।।
Doha 300
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं।।
Doha 301
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।।
Doha 302
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें।।
Doha 303
बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता।।
Doha 304
मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें।।
Doha 305
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा।।
Doha 306
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं।।
Doha 307
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती।।
Doha 308
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा।।
Doha 309
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी।।
Doha 310
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही।।
Doha 311
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई।।
Doha 312
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं।।
Doha 313
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा।।
Doha 314
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना।।
Doha 315
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं।।
Doha 316
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा।।
Doha 317
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा।।
Doha 318
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।।
Doha 319
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी।।
Doha 320
मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं।।
Doha 321
बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।।
Doha 322
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए।।
Doha 323
सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई।।
Doha 324
जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी।।
Doha 325
कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।।नयन लाभु सब सादर लेहीं।।
Doha 326
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।।
Doha 327
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन।।
Doha 328
पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती।।
Doha 329
पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।।
Doha 330
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।
Doha 331
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।।
Doha 332
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती।।
Doha 333
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।।
Doha 334
सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई।।
Doha 335
चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।।
Doha 336
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं।।
Doha 337
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।।
Doha 338
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।।
Doha 339
बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई।।
Doha 340
नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे।।
Doha 341
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा।।
Doha 342
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।।
Doha 343
बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई।।
Doha 344
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे।।
Doha 345
भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।।
Doha 346
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।।
Doha 347
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ।।
Doha 348
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर।।
Doha 349
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।।
Doha 350
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।।
Doha 351
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।।
Doha 352
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।।
Doha 353
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें।।
Doha 354
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू।।
Doha 355
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि।।
Doha 356
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए।।
Doha 357
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।।
Doha 358
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना।।
Doha 359
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई।।
Doha 360
सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।।
Doha 361
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।।