बालकाण्ड
दोहा 162
5 पद
Chaupai1 / 5
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।।
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।।
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(तापस ने कहा) इसलिए जग (संसार) में गुप्त रहता हूँ — हरि को छोड़कर किंचित् भी प्रयोजन (काम) नहीं। प्रभु बिना जनाए सब जानते — कहो, लोक रिझाकर कौन-सी सिद्धि (मिलती)?
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'Therefore I remain hidden in the world — apart from Hari, I have no other purpose. The Lord knows everything without being told — what is gained by pleasing the world?'
Chaupai2 / 5
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।।
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।।
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(तापस ने कहा) तुम सुचि (पवित्र), सुमति (सद्बुद्धि) — मेरे परम प्रिय। मुझ पर तुम्हारी प्रीति-प्रतीति (प्रेम-विश्वास)। अब यदि, तात! तुमसे छिपाऊँ — दारुण (भयंकर) दोष मुझे अत्यन्त लगता।
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'You are pure of heart, supremely dear to me; you have love and faith in me. If I now conceal anything from you, a terrible fault would attach to me.'
Chaupai3 / 5
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।।
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी।।
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जैसे-जैसे तापस उदासीनता (वैराग्य) कहता — वैसे-वैसे नृप को विश्वास उपजता। मन-वाणी-कर्म से स्वबस (वश में) देखकर — तब बगध्यानी (बगुले-जैसा ढोंगी) तापस बोला।
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The more the ascetic spoke of his indifference to the world, the more faith arose in the king's heart. Seeing the king completely under his spell in thought, word, and deed, the heron-like meditative impostor then spoke.
Chaupai4 / 5
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई।।
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।
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(तापस ने कहा) नाम हमारा 'एकतनु', भाई! सुनकर नृप ने फिर सिर नवाकर कहा — (नृप ने कहा) नाम का अर्थ बखानकर कहो — मुझे अत्यन्त अपना सेवक जानकर।
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'My name is Ekatanu, brother.' Hearing this, the king bowed his head and said: 'Please explain the meaning of your name, considering me your very own servant.'
Doha5 / 5
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि।।162।।
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(तापस ने कहा) आदि-सृष्टि (पहली सृष्टि) जब उपजी — तब मेरी उत्पत्ति हुई। नाम 'एकतनु' इसलिए — फिर (दूसरी) देह नहीं धारी।
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'When the first creation arose, then was my birth. The name Ekatanu (one body) is because I have never taken another body since.'