बालकाण्ड
दोहा 238
5 पद
Chaupai1 / 5
घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई।।
कोक सिकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही।।
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(राम ने सोचा) घटता-बढ़ता — विरहिणी (विरह-पीड़ित) को दुखदाई। राहु ग्रसता (निगलता) — अपनी सन्धि (ग्रहण) पाकर। कोक-शिकप्रद (चकवा-पक्षी को कष्ट देने वाला), पंकज (कमल)-द्रोही। अवगुण (दोष) बहुत — हे चन्द्रमा! तुझमें।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
It waxes and wanes, causing sorrow to those separated from their beloved; Rahu swallows it at every eclipse. It torments the chakravaka bird, is hostile to the lotus — O moon, you have many faults.
Chaupai2 / 5
बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे।।
सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी।।
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बैदेही (सीता)-मुख की पटतर (तुलना) दी जाए — तो बड़ा दोष, अनुचित किया। सीता-मुख-छबि विधु (चन्द्रमा) के व्याज (बहाने) बखानकर — निशा (रात) बड़ी (बहुत) जानकर गुरु-पास चले।
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If Vaidehi's face were compared to you, it would be a great offense and most improper. Thus praising Sita's facial beauty under the pretext of the moon, and knowing the night was far advanced, Rama returned to the guru.
Chaupai3 / 5
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा।।
बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे।।
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मुनि-चरण-सरोज (चरण-कमल) को प्रणाम करके — आज्ञा पाकर विश्राम किया। निशा (रात) बीतने पर रघुनायक जागे — बन्धु (भाई) को देखकर ऐसा कहने लगे।
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Bowing at the sage's lotus feet, he received permission and went to rest. When the night had passed, the Lord of the Raghus awoke, and seeing his brother, he began to speak.
Chaupai4 / 5
उदउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता।।
बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी।।
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(श्रीराम ने कहा) तात! अरुण (सूर्य) का उदय देखो — पंकज (कमल), कोक (चकवा), लोक (संसार) — सबको सुखदाता। लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर बोले — प्रभु-प्रभाव सूचक मृदु (कोमल) वाणी।
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'Brother, behold the rising dawn — the sun that brings joy to the lotuses, the chakravaka birds, and all the world.' Lakshmana replied with folded hands, speaking gentle words that hinted at the Lord's glory.
Doha5 / 5
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन।।238।।
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(लक्ष्मण ने कहा) अरुणोदय (सूर्योदय) पर कुमुद (कमलिनी) सकुचे (मुरझाए) — उडगन (तारों) की ज्योति मलीन (धूमिल) हुई। जैसे आपके आगमन सुनकर — नृपति (राजा) बलहीन (शक्तिहीन) हुए।
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'At sunrise the lilies close and the stars lose their light — just as upon hearing of your arrival, the kings have lost their strength.'