बालकाण्ड
दोहा 240
5 पद
Chaupai1 / 5
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।।
लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई।।
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(विश्वामित्र ने कहा) सीता-स्वयंवर जाकर देखें। ईश (ईश्वर) किसे बड़ाई (गौरव) देते — देखें। लक्ष्मण ने कहा — (कहा) वही यश-भाजन (यश का पात्र) — नाथ! जिस पर आपकी कृपा।
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'Let us go and see Sita's swayamvara. I wonder whom the Lord will bless with glory.' Lakshmana said, 'Only he is worthy of glory, Lord, upon whom your grace falls.'
Chaupai2 / 5
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी।।
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला।।
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श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब मुनि हर्षित — सबने सुख मानकर आशीर्वाद दिया। फिर मुनिवृन्द (मुनि-समूह) समेत कृपालु — धनुषमख-शाला (यज्ञ-मण्डप) देखने चले।
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The sages were delighted to hear these fine words and gave blessings, and all felt happy. Then the compassionate Lord, accompanied by the assembly of sages, set forth to see the bow-sacrifice arena.
Chaupai3 / 5
रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।।
चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।।
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रंगभूमि (मैदान) में दोनों भाई आए — ऐसी सुधि (सूचना) सब पुरवासियों ने पाई। सब गृह-काज (घर का काम) बिसारकर (भूलकर) चले — बालक, जवान, बूढ़े नर-नारी।
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When the two brothers arrived at the arena, all the townsfolk received the news. Everyone set out, forgetting their household tasks — children, youth, old men and women alike.
Chaupai4 / 5
देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी।।
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू।।
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जनक ने देखा — भारी भीड़ हो गई। शुचि (विश्वस्त) सेवकों को सब बुलाकर (कहा) — तुरन्त सकल लोगों के पास जाओ — सबको उचित आसन दो।
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Seeing the enormous crowd, Janaka summoned his trusted servants and said, 'Go at once to all the people and give everyone an appropriate seat.'
Doha5 / 5
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।।240।।
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मृदु (कोमल) विनीत (विनम्र) वचन कहकर उन्होंने — नर-नारी बैठाए। उत्तम, मध्यम, नीच, लघु (छोटे) — अपनी-अपनी थल (स्थान) अनुसार।
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Speaking gentle, polite words, they seated all the men and women — high, middle, low, and humble — each in their proper place according to their station.