बालकाण्ड
दोहा 336
6 पद
Chaupai1 / 6
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं।।
रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई।।
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राम-छबि (सौन्दर्य) देखकर अत्यन्त अनुरागी (प्रेममग्न) — प्रेमविवश बार-बार पद (चरणों) पर गिरतीं। लाज (लज्जा) न रही — प्रीति उर (हृदय) में छाई — सहज स्नेह — वर्णन कैसे हो?
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Seeing Rama's beauty, the queens were filled with deep love and again and again fell at his feet. All modesty vanished, overwhelmed by affection—how can such natural love be described?
Chaupai2 / 6
भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए।।
बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी।।
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भाइयों सहित उबटी (हल्दी) लगाकर नहलाया। छह रस (स्वाद) के अशन (भोजन) — अत्यन्त हेतु (प्रेम) से खिलाया। राम सुअवसर (शुभ अवसर) जानकर बोले — शील-स्नेह-सकुचमय (संकोचपूर्ण) वाणी।
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They bathed the brothers with turmeric paste and lovingly fed them a six-course meal. Then Rama, knowing the right moment, spoke with words of courtesy, affection, and gentle shyness.
Chaupai3 / 6
राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए।।
मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू।।
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(श्रीराम ने कहा) राजा अवधपुर (अयोध्या) चलना चाहते। विदा होने हम यहाँ भेजे गए। माताओं! मुदित (प्रसन्न) मन आज्ञा दो। बालक जानकर नित्य स्नेह करना।
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"The king wishes to proceed to Ayodhya; we have been sent here to take leave. O mothers, kindly give us your joyful permission. Knowing us as children, always shower us with your love."
Chaupai4 / 6
सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू।।
हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही।।
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वचन सुनकर रनिवास (अन्तःपुर) बिलखा (दुखी हुआ)। प्रेमवश सासुएँ बोल नहीं सकतीं। कुँवरियों (बहुओं) को सब हृदय से लगाकर लिया — पतियों (को) सौंपकर अत्यन्त विनती की।
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Hearing these words, the inner court was grieved. The mothers-in-law, overcome with love, could not speak. They embraced all the princesses to their hearts and, entrusting them to their husbands, made earnest entreaties.
Chhand5 / 6
करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै।
बलि जाँउ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै।।
परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी।
तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी।।
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विनय करके सीता राम को समर्पी — हाथ जोड़कर बार-बार कहतीं। (कहतीं) बलि (बलिहारी) जाऊँ, तात! सुजान (बुद्धिमान) — आपको सबकी गति विदित (ज्ञात)। परिवार, पुरजन (नगरवासी), मुझे, राजा को — प्राणप्रिय सीता जानना। (तुलसीदास कहते हैं) शील-स्नेह देखकर — निज किंकरी (दासी) करके मानना।
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Making humble entreaty and entrusting Sita to Rama, she said again and again with folded hands: "I bow to you, O wise one! You know the state of everyone's heart. The family, the citizens, and I—all consider Sita as dear as our own life. O Lord of Tulasi, seeing your grace and affection, please accept her as your humble servant."
Doha6 / 6
तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय।
जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन।।336।।
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(सीता की माता ने कहा) आप परिपूर्णकाम (सब इच्छाएँ पूर्ण) — ज्ञान-शिरोमणि — भावप्रिय (भक्ति-प्रिय)। जन (भक्तों) के गुण-गाहक (पारखी) राम — दोष-दलन (दोष-नाशक), करुणायतन (करुणा-निवास)।
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"You are complete in all desires, O crest-jewel of the wise, dear to devotion. O Rama, you appreciate the virtues of your servants, you destroy their faults, you are the abode of compassion."