बालकाण्ड
दोहा 345
5 पद
Chaupai1 / 5
भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।।
मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।।
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भूप-भवन (राजमहल) उस अवसर पर शोभा — रचना देखकर मदन (कामदेव) का मन मोहित। मंगल-शगुन (शुभ-शकुन), मनोहरता — ऋद्धि-सिद्धि-सुख-सम्पदा सुहावनी।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
The king's palace at that time was so splendid that even Kamadeva's mind was enchanted by its decoration. Auspicious omens, captivating beauty, prosperity, and every kind of happiness were present.
Chaupai2 / 5
जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ दसरथ गृहँ छाए।।
देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही।।
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मानो सब उछाह (उत्साह) — सहज सुहावने — तनु (शरीर) धरि-धरि (धारण करके) दशरथ-गृह (घर) में छाए। राम-बैदेही (सीता) देखने हेतु — कहो, लालसा (इच्छा) किसे न हो?
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It was as if all forms of joy had assumed bodies and filled Dasharatha's home. Who would not yearn to see Rama and Vaidehi?
Chaupai3 / 5
जुथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासनि।।
सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती।।
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जूथ-जूथ (समूह-समूह) मिलकर सुवासिनी (सुहागिनें) चलीं — निज छबि (शोभा) से मदन-विलासिनी (कामदेव-पत्नी रति) को तुच्छ जानतीं। सकल सुमंगल सजाकर आरती — गातीं — मानो बहुरूपी भारती (सरस्वती)।
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Groups upon groups of married women set forth, their beauty surpassing that of Kamadeva's consorts. All adorned with auspicious articles and arati plates, they sang as if Saraswati herself had assumed many forms.
Chaupai4 / 5
भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई।।
कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं।।
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भूपति-भवन (राजमहल) में कोलाहल होता — वह समय-सुख वर्णन नहीं हो सकता। कौसल्या आदि राम-माताएँ — प्रेम-विवश — तन (शरीर) की दशा भुलाईं।
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There was a tumult in the king's palace; the joy of that moment cannot be described. Kausalya and the other mothers of Rama were so overwhelmed with love that they forgot their bodily state.
Doha5 / 5
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी।
प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि।।345।।
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विप्रों (ब्राह्मणों) को विपुल (बहुत) दान दिए — गणेश-पुरारि (शिव) पूजकर। परम प्रमुदित (अत्यन्त प्रसन्न) — मानो परम दरिद्र ने चार पदार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) पाए।
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Generous gifts were given to the Brahmins; Ganesha and Shiva were worshipped. They were supremely delighted, like one who had been utterly destitute finding all four treasures of life.