अयोध्याकाण्ड
दोहा 260
5 पद
Chaupai1 / 5
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।
लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
मुनि-वचन सुनकर, राम का रुख (= इच्छा) पाकर — गुरु-स्वामी अत्यन्त अनुकूल देखकर। अपने सिर पर सब छरु (= छत्र = जिम्मेदारी) भार देखकर — कहने में (भरत को) संकोच।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
suni muni bacana rāma rukha pāī. gura sāhiba anukūla aghāī.
lakhi apane sira sabu charu bhā
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Hearing the sage's words and finding Rama favorably disposed, the Guru and master gracious beyond measure, seeing that all the burden had been placed on his head.
Chaupai2 / 5
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।।
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
पुलकित शरीर — सभा में खड़े हुए — नीरज (कमल) नयन — स्नेह-जल बढ़ा (= आँसू)। (भरत ने कहा) मेरा कहना मुनिनाथ ने निभाया — इससे अधिक (क्या कहूँ)।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
pulaki sarīra sabhāṃ bhae ṭhāḍheṃ. nīraja nayana neha jala bāḍheṃ.
kahaba mora muninātha nibāhā.
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Standing in the assembly with thrilling body, his lotus eyes overflowing with tears: 'The sage has upheld my cause.'
Chaupai3 / 5
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।
मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
(भरत ने कहा) मैं अपने नाथ (राम) का स्वभाव जानता हूँ — अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं। मुझ पर विशेष कृपा-स्नेह — खेलते (बचपन में) खिजते (= रूठते) नहीं थे।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
maiṃ jānauṃ nija nātha subhāū. aparādhihu para koha na kāū.
mo para kṛpā saneha biseṣī. khe
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'I know my Lord's gracious nature — He is never angry even with offenders. His grace and affection for me are special.'
Chaupai4 / 5
सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
(भरत ने कहा) बचपन से (राम ने) संग (= साथ) नहीं छोड़ा — कभी मेरे मन को भंग (= दुखी) नहीं किया। मैं प्रभु-कृपा की रीति (= रीत) मन में देखता हूँ।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
sisupana tema parihareūṃ na saṃgū. kabahu na kīnha mora mana bhaṃgū.
maiṃ prabhu kṛpā rīti
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'From childhood, He never left my company. He never once hurt my feelings. I know the Lord's ways of grace.'
Doha5 / 5
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
(भरत ने कहा) मैंने भी स्नेह-संकोच वश — सन्मुख (= आमने-सामने) बात नहीं कही। दर्शन से तृप्त नहीं आज तक — प्रेम-प्यासे नेत्र।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
mahūṃ saneha sakoca basa sanamukha kahī na baina.
darasana tṛpita na āju lagi pema piāse naina.
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'Overcome by love and shyness, I have never spoken my heart face to face. My eyes, ever thirsty for love, have never been satisfied by His darshan until today.'