अयोध्याकाण्ड

श्रीरामचरितमानस — हिन्दी अर्थ और अंग्रेज़ी अनुवाद सहित

326 दोहे · 1633 पद

अयोध्याकाण्ड में कैकेयी के दो वरदान, श्रीराम का सीता और लक्ष्मण सहित चौदह वर्ष का वनवास, राजा दशरथ का शोक और देहावसान, तथा भरत का चित्रकूट जाकर श्रीराम को लौटाने का प्रयास वर्णित है।

मंगलाचरण

यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके

दोहा 1

जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।

दोहा 2

एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।

दोहा 3

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।

दोहा 4

सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।

दोहा 5

मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।

दोहा 6

हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।

दोहा 7

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।

दोहा 8

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।

दोहा 9

तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।

दोहा 10

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।

दोहा 11

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।

दोहा 12

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।

दोहा 13

दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।

दोहा 14

कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।

दोहा 15

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।

दोहा 16

एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।

दोहा 17

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।

दोहा 18

चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।

दोहा 19

भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।

दोहा 20

कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।

दोहा 21

नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।

दोहा 22

कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।

दोहा 23

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।

दोहा 24

बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।

दोहा 25

कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।।

दोहा 26

अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।।

दोहा 27

पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।।

दोहा 28

जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।

दोहा 29

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।

दोहा 30

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।

दोहा 31

आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।

दोहा 32

राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।।

दोहा 33

जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।

दोहा 34

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।

दोहा 35

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।

दोहा 36

चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।

दोहा 37

राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।

दोहा 38

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।

दोहा 39

आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।।

दोहा 40

सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।

दोहा 41

निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।।

दोहा 42

भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।

दोहा 43

रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।।

दोहा 44

अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।।

दोहा 45

अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।

दोहा 46

धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।

दोहा 47

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।

दोहा 48

का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।।

दोहा 49

एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।

दोहा 50

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।

दोहा 51

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।

दोहा 52

रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।।

दोहा 53

तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।

दोहा 54

बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।।

दोहा 55

राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।

दोहा 56

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।

दोहा 57

देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।।

दोहा 58

दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।

दोहा 59

मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।

दोहा 60

बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।।

दोहा 61

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।।

दोहा 62

मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।।

दोहा 63

नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।

दोहा 64

सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।

दोहा 65

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।।

दोहा 66

बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।।

दोहा 67

मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।।

दोहा 68

अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।।

दोहा 69

लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।।

दोहा 70

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।

दोहा 71

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।

दोहा 72

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।।

दोहा 73

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।।

दोहा 74

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।।

दोहा 75

पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।

दोहा 76

गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।।

दोहा 77

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।।

दोहा 78

रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।।

दोहा 79

सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।।

दोहा 80

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।।

दोहा 81

एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।

दोहा 82

जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।।

दोहा 83

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।।

दोहा 84

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।

दोहा 85

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।।

दोहा 86

जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।।

दोहा 87

सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।

दोहा 88

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।

दोहा 89

राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।।

दोहा 90

उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।

दोहा 91

बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।

दोहा 92

भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।।

दोहा 93

अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।।

दोहा 94

सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू।।

दोहा 95

तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।

दोहा 96

तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।

दोहा 97

बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।।

दोहा 98

पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।

दोहा 99

प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।।

दोहा 100

जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।

दोहा 101

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।।

दोहा 102

उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।

दोहा 103

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।

दोहा 104

गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।।

दोहा 105

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।।

दोहा 106

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।

दोहा 107

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।।

दोहा 108

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।।

दोहा 109

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।

दोहा 110

सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।।

दोहा 111

राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।।

दोहा 112

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।।

दोहा 113

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।।

दोहा 114

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।

दोहा 115

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।।

दोहा 116

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।।

दोहा 117

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।।

दोहा 118

पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।।

दोहा 119

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।।

दोहा 120

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।।

दोहा 121

नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।।

दोहा 122

गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।।

दोहा 123

आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।।

दोहा 124

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।।

दोहा 125

मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।

दोहा 126

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।।

दोहा 127

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।

दोहा 128

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।।

दोहा 129

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।।

दोहा 130

काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।

दोहा 131

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।।

दोहा 132

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।।

दोहा 133

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।।

दोहा 134

अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।।

दोहा 135

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।।

दोहा 136

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।।

दोहा 137

रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।

दोहा 138

केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।।

दोहा 139

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।

दोहा 140

राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।।

दोहा 141

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।।

दोहा 142

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।।

दोहा 143

धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।।

दोहा 144

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।।

दोहा 145

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।।

दोहा 146

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।।

दोहा 147

एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।

दोहा 148

अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।।

दोहा 149

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।।

दोहा 150

पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।

दोहा 151

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।।

दोहा 152

पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।।

दोहा 153

तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।।

दोहा 154

प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।।

दोहा 155

धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।

दोहा 156

जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।।

दोहा 157

तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।।

दोहा 158

चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।

दोहा 159

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।।

दोहा 160

तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।।

दोहा 161

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।

दोहा 162

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।।

दोहा 163

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।

दोहा 164

भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।

दोहा 165

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।

दोहा 166

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।।

दोहा 167

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।

दोहा 168

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।

दोहा 169

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।

दोहा 170

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।।

दोहा 171

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।

दोहा 172

अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।

दोहा 173

बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।

दोहा 174

सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।

दोहा 175

अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।

दोहा 176

कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।

दोहा 177

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।।

दोहा 178

हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।

दोहा 179

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।।

दोहा 180

कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।।

दोहा 181

कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।।

दोहा 182

गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।।

दोहा 183

आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।।

दोहा 184

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।।

दोहा 185

भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।।

दोहा 186

घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।।

दोहा 187

चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।।

दोहा 188

राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।।

दोहा 189

सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।।

दोहा 190

होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।।

दोहा 191

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।

दोहा 192

राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।।

दोहा 193

लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।

दोहा 194

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।।

दोहा 195

नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।।

दोहा 196

कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।

दोहा 197

सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।।

दोहा 198

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।।

दोहा 199

कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।।

दोहा 200

लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।।

दोहा 201

राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ।।

दोहा 202

सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।।

दोहा 203

कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।।

दोहा 204

झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।।

दोहा 205

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।

दोहा 206

प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।।

दोहा 207

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।।

दोहा 208

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।।

दोहा 209

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।

दोहा 210

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।।

दोहा 211

मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।।

दोहा 212

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।।

दोहा 213

सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।।

दोहा 214

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।।

दोहा 215

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।।

दोहा 216

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।।

दोहा 217

जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।।

दोहा 218

बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने।।

दोहा 219

सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।।

दोहा 220

सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी।।

दोहा 221

जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू।।

दोहा 222

कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं।।

दोहा 223

भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।।

दोहा 224

निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।

दोहा 225

मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।।

दोहा 226

सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।।

दोहा 227

बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।।

दोहा 228

बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।

दोहा 229

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।

दोहा 230

उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।

दोहा 231

जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।

दोहा 232

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।

दोहा 233

जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।

दोहा 234

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।

दोहा 235

सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।।

दोहा 236

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।

दोहा 237

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।।

दोहा 238

सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।।

दोहा 239

सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।।

दोहा 240

सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।।

दोहा 241

मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।।

दोहा 242

भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।

दोहा 243

सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।।

दोहा 244

आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।

दोहा 245

गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई।।

दोहा 246

सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।।

दोहा 247

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।।

दोहा 248

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।।

दोहा 249

राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।।

दोहा 250

कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।

दोहा 251

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।।

दोहा 252

पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।।

दोहा 253

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।।

दोहा 254

बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।।

दोहा 255

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।।

दोहा 256

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।

दोहा 257

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।

दोहा 258

आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।

दोहा 259

गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।

दोहा 260

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।

दोहा 261

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।

दोहा 262

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।

दोहा 263

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।।

दोहा 264

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।।

दोहा 265

सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।।

दोहा 266

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।।

दोहा 267

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।

दोहा 268

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।।

दोहा 269

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।

दोहा 270

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।

दोहा 271

कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।।

दोहा 272

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।।

दोहा 273

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।।

दोहा 274

सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।

दोहा 275

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।

दोहा 276

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।

दोहा 277

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।

दोहा 278

जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।।

दोहा 279

कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।।

दोहा 280

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।।

दोहा 281

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।।

दोहा 282

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।।

दोहा 283

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।।

दोहा 284

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।।

दोहा 285

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।।

दोहा 286

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।।

दोहा 287

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।।

दोहा 288

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।।

दोहा 289

अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।।

दोहा 290

राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।।

दोहा 291

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।

दोहा 292

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।

दोहा 293

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।

दोहा 294

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।।

दोहा 295

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।।

दोहा 296

करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।

दोहा 297

सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।

दोहा 298

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।।

दोहा 299

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।।

दोहा 300

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।।

दोहा 301

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।।

दोहा 302

कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।।

दोहा 303

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे।।

दोहा 304

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।।

दोहा 305

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।

दोहा 306

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।।

दोहा 307

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।।

दोहा 308

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।।

दोहा 309

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई।

दोहा 310

भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।।

दोहा 311

कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।।

दोहा 312

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।।

दोहा 313

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।

दोहा 314

पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।।

दोहा 315

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।।

दोहा 316

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।

दोहा 317

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।

दोहा 318

जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।

दोहा 319

सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।

दोहा 320

परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।।

दोहा 321

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।।

दोहा 322

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।।

दोहा 323

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।।

दोहा 324

राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।।

दोहा 325

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।।

दोहा 326

पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।