बालकाण्ड
दोहा 148
5 पद
Chaupai1 / 5
पद राजीव बरनि नहि जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं।।
बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला।।
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पद-राजीव (चरण-कमल) — वर्णन नहीं हो सकता — जिनमें मुनि-मन-रूपी मधुप (भौंरे) बसते। बाम (बायें) भाग में अनुकूला (प्रिया) शोभित — आदिशक्ति, छबिनिधि (सौन्दर्य-खान), जगमूल (जगत का मूल)।
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His lotus feet cannot be described — in them dwell the bee-like minds of sages. On His left side shone His consort, the primordial power, treasure-house of beauty, and root of the universe.
Chaupai2 / 5
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी।।
भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई।।
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जिनके अंश से गुणखानी (गुणों की खान) — अगणित लक्ष्मी, उमा, ब्रह्माणी उत्पन्न होतीं। जिनकी भृकुटि (भौंह)-विलास से जगत होता — वही सीता श्रीराम की बायीं ओर।
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From a fraction of whom are born all virtuous Lakshmis, Umas, and Brahmanis — by the play of whose brow the world comes into being — that Sita stood at Rama's left side.
Chaupai3 / 5
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी।।
चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा।।
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छबि-समुद्र श्रीहरि का रूप देखकर — एकटक (निमिष-रहित) रहे, नयन-पट (पलकें) रोककर। सादर अनूप (अनुपम) रूप चितवते (निहारते) — तृप्ति नहीं मानते मनु-शतरूपा।
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Beholding the ocean-of-beauty form of Hari, they gazed with unblinking eyes. They gazed reverently at that incomparable form, yet Manu and Shatarupa could not feel satiated.
Chaupai4 / 5
हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी।।
सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा।।
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हर्ष-विवश — तन की दशा भूली। दण्ड (लकड़ी) की भाँति गिरे — पद (चरण) पकड़कर। प्रभु ने अपने कर-कंज (कमल-हाथ) से सिर स्पर्श किया — करुणापुंज (करुणा-राशि) ने तुरन्त उठाया।
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Overwhelmed with joy, they forgot the state of their bodies and fell like sticks, clasping His feet with their hands. The Lord, that mass of compassion, touched their heads with His lotus hands and quickly raised them up.
Doha5 / 5
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।
मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि।।148।।
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कृपानिधान फिर बोले — (कहा) मुझे अति प्रसन्न जानो। जो मन में भाए — वर माँगो — महादानी (महान दाता) अनुमानकर (जानकर)।
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The ocean of mercy spoke again: 'Know Me to be supremely pleased. Ask whatever boon your heart desires, regarding Me as the greatest of givers.'