बालकाण्ड
दोहा 149
5 पद
Chaupai1 / 5
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी।।
नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे।।
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प्रभु-वचन सुनकर दोनों हाथ जोड़कर — धीरज धरकर मृदु (कोमल) वाणी बोले। (मनु ने कहा) नाथ! आपके पद-कमल देखकर — अब सब काम (इच्छाएँ) हमारे पूरे हुए।
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Hearing the Lord's words, joining both palms together and gathering courage, Manu spoke in gentle words: 'Lord, having seen Your lotus feet, all our desires are now fulfilled.'
Chaupai2 / 5
एक लालसा बड़ि उर माही। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं।।
तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं।।
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(मनु ने कहा) एक बड़ी लालसा हृदय में है — सुगम (सरल) भी, अगम (कठिन) भी — कही नहीं जाती। आपको देना अत्यन्त सुगम, गोसाईं (स्वामी)! — पर मुझे अपनी कृपणता (दीनता) से अगम लगती।
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'Yet one great longing remains in my heart — one that is both easy and impossible to express. For You to give it is very easy, O Master, but my own meagreness makes it seem impossible.'
Chaupai3 / 5
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई।।
तासु प्रभा जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई।।
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(मनु ने कहा) जैसे दरिद्र (गरीब) कल्पवृक्ष पाकर — बहुत सम्पत्ति माँगते सकुचाता (संकोच करता)। उसकी प्रभा (शक्ति) वह नहीं जानता — वैसे ही हृदय में मेरा संशय।
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'Just as a poor man who obtains the wish-fulfilling tree feels shy to ask for great wealth, not knowing its power — similarly, there is doubt in my heart.'
Chaupai4 / 5
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी।।
सकुच बिहाइ मागु नृप मोहि। मोरें नहिं अदेय कछु तोही।।
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(मनु ने कहा) वह आप जानो, अन्तर्यामी! मेरा मनोरथ पूरो, स्वामी! (श्रीहरि ने कहा) संकोच छोड़कर माँगो, नृप! मेरे पास तुम्हें अदेय (न देने योग्य) कुछ नहीं।
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'You know it, O Indweller of all hearts! Fulfill my desire, O Lord!' The Lord replied: 'Set aside your hesitation and ask, O King — there is nothing that I cannot give you.'
Doha5 / 5
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।।
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ।।149।।
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(मनु ने कहा) दानी-शिरोमणि, कृपानिधि, नाथ! सत्यभाव (सच्चा भाव) कहता हूँ। आप-समान पुत्र चाहता हूँ — प्रभु से कौन-सा छिपाव (रहस्य)?
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'O crest-jewel of givers, O ocean of compassion, Lord, I speak my true feeling. I desire a son like You — what can one hide from the Lord?'