बालकाण्ड
दोहा 150
5 पद
Chaupai1 / 5
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले।।
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई।।
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प्रीति देखकर, अमोल (अमूल्य) वचन सुनकर — करुणानिधि बोले — 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)। (श्रीहरि ने कहा) अपने-सरिस (समान) कहाँ जाकर खोजूँ? नृप! तुम्हारा तनय (पुत्र) मैं आकर होऊँगा।
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Seeing their love and hearing their priceless words, the ocean of compassion said 'So be it.' 'Where shall I go searching for one equal to Myself? O King, I shall Myself come and be born as your son.'
Chaupai2 / 5
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरे।।
जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा।।
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शतरूपा को हाथ जोड़कर देखकर (श्रीहरि ने कहा) — देवि! जो रुचि हो, वर माँगो। (शतरूपा ने कहा) जो वर नाथ से चतुर नृप (मनु) ने माँगा — वही, कृपालु! मुझे अत्यन्त प्रिय लगा।
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Looking at Shatarupa standing with folded hands, He said: 'O Queen, ask for whatever boon pleases you.' She replied: 'The boon that my wise husband asked for — that same one, O Merciful Lord, is supremely dear to me.'
Chaupai3 / 5
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई।।
तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी।।
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(शतरूपा ने कहा) प्रभु! पर अत्यन्त ढिठाई (धृष्टता) होती — यद्यपि भक्त-हित आपको सोहाती (अच्छी लगती)। आप ब्रह्मा आदि के जनक, जग-स्वामी — ब्रह्म, सकल उर (हृदय) के अन्तर्यामी।
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'But Lord, it is great boldness on my part to say more, even though such boldness pleases You for the sake of Your devotees. You are the father of Brahma and all, the Lord of the universe, the Supreme Spirit dwelling in every heart.'
Chaupai4 / 5
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई।।
जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं।।
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(शतरूपा ने कहा) ऐसा समझते मन में संशय होता — (पर) जो प्रभु ने कहा — वही प्रमाण। जो आपके निज-भक्त हैं, नाथ! — जो सुख पाते, जो गति (दशा) लहते —
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'Thinking thus, doubt arises in my mind. But whatever the Lord has promised, that shall come true. Those who are Your true devotees, Lord — whatever joy they obtain, whatever state they reach—'
Doha5 / 5
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।।
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु।।150।।
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(शतरूपा ने कहा) वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही निज-चरण-स्नेह। वही विवेक, वही रहनि (जीवन-शैली) — प्रभु! हमें कृपा करके दो।
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'That same joy, that same state, that same devotion, that same love for Your feet, that same wisdom, that same way of life — Lord, graciously grant all that to us.'