बालकाण्ड
दोहा 151
5 पद
Chaupai1 / 5
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।।
जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं।।
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मृदु (कोमल), गूढ़ (गहन), रुचिर (सुन्दर) वर-रचना (प्रार्थना) सुनकर — कृपासिन्धु मृदु वचन बोले। (श्रीहरि ने कहा) जो कुछ तुम्हारे मन में रुचि है — मैंने वह सब दिया, संशय नहीं।
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Hearing her gentle, profound, and beautiful prayer, the ocean of compassion spoke soft words: 'Whatever is in your heart's desire, I have given it all — have no doubt.'
Chaupai2 / 5
मातु बिबेक अलोकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें ।
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनति प्रभु मोरी।।
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(श्रीहरि ने कहा) माता! तुम्हारा अलौकिक विवेक — मेरे अनुग्रह (कृपा) से कभी नहीं मिटेगा। मनु ने चरण वन्दन करके फिर कहा — (कहा) प्रभु! और एक विनती मेरी।
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'Mother, your extraordinary wisdom shall never fade by My grace.' Bowing at His feet, Manu spoke again: 'Lord, I have one more request.'
Chaupai3 / 5
सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ।।
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना।।
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(मनु ने कहा) पुत्र-विषयक (पुत्र मिलने पर भी) आपके पद में रति (प्रेम) हो — मुझे कोई बड़ा मूढ़ कहे (तो कहे)। मणि बिना फन (साँप) जैसे, जल बिना मीना (मछली) — वैसे मेरा जीवन आपके अधीन।
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'May I have devotion to Your feet even when I am blessed with sons — let anyone call me a great fool for it. Like a serpent without its gem, like a fish without water, my life is dependent on You.'
Chaupai4 / 5
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ।।
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी।।
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ऐसा वर माँगकर चरण पकड़कर रहे। करुणानिधि ने कहा — 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)। (श्रीहरि ने कहा) अब तुम मेरे अनुशासन (आज्ञा) मानकर — जाकर सुरपति (इन्द्र) की राजधानी (अमरावती) में बसो।
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Having asked this boon, he clung to the Lord's feet. The ocean of mercy said 'So be it.' 'Now, following My command, go and dwell in the capital of Indra.'
Soratha5 / 5
तहँ करि भोग बिसाल तात गउँ कछु काल पुनि।
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत।।151।।
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(श्रीहरि ने कहा) वहाँ विशाल भोग करके, तात! कुछ काल बीतने पर — अवध (अयोध्या) के भूपाल (राजा) होगे — तब मैं तुम्हारा सुत (पुत्र) होऊँगा।
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'There, enjoying great pleasures for some time, dear one, you shall then become the king of Ayodhya, and I shall become your son.'