बालकाण्ड
दोहा 154
5 पद
Chaupai1 / 5
नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना।।
सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा।।
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नृप (राजा) का हितकारक सयाना (बुद्धिमान) सचिव (मन्त्री) — नाम धर्मरुचि, शुक्र (शुक्राचार्य) समान। सचिव सयान (चतुर), बन्धु (भाई) बलवीर — आपु (स्वयं राजा) प्रतापपुंज (प्रताप-राशि), रणधीर (युद्ध में वीर)।
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The king had a wise minister who served his interests, named Dharmaruchi, equal to Shukra. With a clever minister, a brave brother, and himself being a mighty warrior in battle—
Chaupai2 / 5
सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा।।
सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना।।
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सेना — चतुरंग (चार अंगों वाली) अपार। अमित (अगणित) सुभट (योद्धा), सब समर (युद्ध) में जूझने वाले। सेना देखकर राजा हर्षित — और गहगहे (गम्भीर) निशान (युद्ध-ढोल) बजे।
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His army was vast, with all four divisions beyond measure — countless warriors, all fierce in combat. Seeing the army, the king was delighted, and war drums resounded mightily.
Chaupai3 / 5
बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई।।
जँह तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआई।।
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विजय हेतु कटकई (सेना) बनाई — सुदिन (शुभ दिन) साधकर नृप बाजे बजाते चले। जहाँ-तहाँ अनेक लड़ाइयाँ पड़ीं — सब राजाओं को बरिआई (बलपूर्वक) जीता।
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Having assembled his army for conquest, the king set out on an auspicious day with drums beating. Wherever they went, many battles were fought, and he defeated all kings by force.
Chaupai4 / 5
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें।।
सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला।।
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सप्त द्वीप भुजबल से वश किए — दण्ड (कर) लेकर राजाओं को छोड़ दिया। सकल अवनि (पृथ्वी) मण्डल में उस काल — एक प्रतापभानु ही महीपाल (राजा)।
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He conquered the seven continents by the strength of his arms; exacting tribute, he released the kings. In that entire age, on all the earth, Pratapabhanu alone was the sovereign.
Doha5 / 5
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।
अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु।।154।।
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बाहुबल से विश्व स्वबस (अधीन) करके निज पुर (नगर) में प्रवेश किया। अर्थ, धर्म, काम आदि सुख — समय-समय पर नरेश (राजा) सेवन करते।
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Having brought the whole world under his control by the strength of his arms, he returned to his own city. The king enjoyed the pleasures of wealth, duty, and desire, each in its proper time.