बालकाण्ड

दोहा 170

5 पद

Chaupai1 / 5
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी।। श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई।।
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नृप ने आज्ञा मानकर शयन किया — छलज्ञानी (छली ज्ञानी) जाकर आसन पर बैठा। श्रमित (थका) भूप — अत्यन्त निद्रा आई। वह (तापस) कैसे सोए — अत्यधिक सोच (चिन्ता) में।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
The king obeyed and lay down to sleep; the cunning schemer sat on his seat. The weary king fell into deep slumber, but the other could not sleep due to his excessive scheming.
Chaupai2 / 5
कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा।। परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा।।
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कालकेतु निशाचर (राक्षस) वहाँ आया — जिसने सूकर (सूअर) होकर नृप को भुलाया था। तापस-नृप का परम मित्र — वह अत्यन्त कपट जानता।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
Then came Kalanemi, the demon who had assumed the form of the boar that had led the king astray. He was the closest friend of the disguised king-turned-ascetic, and knew all his many intrigues.
Chaupai3 / 5
तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई।। प्रथमहि भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे।।
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उसके सौ पुत्र और दस भाई — खल (दुष्ट), अत्यन्त अजय (अजेय), देवताओं को दुख देने वाले। पहले भूप (प्रतापभानु) ने समर (युद्ध) में सब मारे — विप्र, सन्त, देवता देखकर दुखी हुए।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
He had a hundred sons and ten brothers — all wicked, invincible, and tormenting the gods. The king had earlier slain them all in battle, while Brahmins, saints, and gods looked on in distress.
Chaupai4 / 5
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा।। जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ।।
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उस खल (दुष्ट) ने पिछला वैर (शत्रुता) सम्भारा (याद किया) — तापस-नृप से मिलकर मन्त्र (षड्यन्त्र) विचारा। जिससे रिपु (शत्रु) का क्षय (विनाश) हो — वही उपाय रचा। भावी (भाग्य) वश — राजा कुछ नहीं जानता।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
The wicked one recalled his old enmity; together with the ascetic-king, they hatched a plot. They devised a scheme to destroy their enemy — but the king, controlled by destiny, knew nothing of it.
Doha5 / 5
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु। अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु।।170।।
हिन्दी अर्थ देखें
रिपु (शत्रु) तेजस्वी हो, अकेला भी हो — उसे लघु (छोटा) करके मत गिनो। आज भी रवि (सूर्य) और शशि (चन्द्रमा) को दुख देता — सिर-अवशेषित (केवल सिर बचा) राहु।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
An enemy should not be belittled even if he is powerful and alone. Even today, though reduced to just a head, Rahu continues to torment the sun and moon.

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