बालकाण्ड
दोहा 183
6 पद
Chaupai1 / 6
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।।
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा।।
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इन्द्रजीत से जो कुछ कहा — वह सब मानो पहले ही कर चुका था। पहले जिन्हें आज्ञा दी — उनका चरित्र सुनो जो किया।
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Whatever Ravana had commanded Indrajit, he had already accomplished long before. Now hear what those to whom he gave orders first actually did.
Chaupai2 / 6
देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी।।
करहि उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया।।
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देखने में भीमरूप (भयानक), सब पापी। निशाचर-निकर (राक्षस-समूह) — देवताओं को सताने वाले। असुर-निकाय (राक्षस-समूह) उपद्रव करते — नाना रूप माया से धारण करते।
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All those sinful demons, terrible in appearance — hosts of night-wanderers, tormentors of the gods — they caused havoc everywhere, assuming various forms through their magical powers.
Chaupai3 / 6
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।।
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।।
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जिस विधि धर्म निर्मूल (जड़ से उखड़) हो — वह सब करते — वेद-प्रतिकूल (विरुद्ध)। जिस-जिस देश में धेनु (गाय), द्विज (ब्राह्मण) पाते — नगर, गाँव, पुर में आग लगाते।
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Whatever would uproot dharma, they did everything contrary to the Vedas. Wherever they found cows and Brahmins, they set fire to cities, villages, and towns.
Chaupai4 / 6
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू मान न कोई।।
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।।
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शुभ (अच्छा) आचरण कहीं नहीं होता। देवता, विप्र (ब्राह्मण), गुरु — कोई मान (सम्मान) नहीं करता। न हरि-भक्ति, न यज्ञ, न तप, न ज्ञान — सपने में भी वेद-पुराण नहीं सुनाई देते।
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Virtuous conduct ceased everywhere; no one honored gods, Brahmins, or gurus. There was no devotion to Hari, no sacrifices, austerity, or knowledge; the Vedas and Puranas could not even be heard in dreams.
Chhand5 / 6
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।।
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहि काना।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।।
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जप, योग, वैराग्य, तप, यज्ञ — भागा (लुप्त हुआ) — (यदि कोई करता तो) श्रवण (कान) सुने दशसीस (रावण)। आपुनु (स्वयं) उठकर धावता (दौड़ता) — रहने न पाता — पकड़कर सबको खीसा (क्रोध से) घालता (नष्ट करता)। ऐसा भ्रष्ट आचार संसार में हुआ — धर्म कान से भी नहीं सुनाई देता। जो वेद-पुराण कहे — उसे बहु विधि त्रासता (डराता), देश-निकासी (निर्वासन) देता।
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If Ravana heard of anyone practicing prayer, yoga, renunciation, austerity, or sacrifice, he would rise and rush there himself, and finding them, would destroy them in rage. Such corruption spread throughout the world that dharma could not even be heard of. In many ways he would terrorize and exile anyone who spoke of the Vedas and Puranas.
Soratha6 / 6
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति।।183।।
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वर्णन नहीं हो सकता — घोर अनीति जो निशाचर (राक्षस) करते। हिंसा पर अत्यन्त प्रीति — उनके पापों की कौन-सी मिति (सीमा)?
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The terrible injustices committed by the demons cannot be described. Their supreme delight was in violence — what limit could there be to their sins?