बालकाण्ड

दोहा 185

5 पद

Chaupai1 / 5
बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।। पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।
हिन्दी अर्थ देखें
सब देवता बैठकर विचार करते — कहाँ प्रभु पाएँ, कहाँ पुकार करें? कोई कहता — पुर (नगर) वैकुण्ठ जाओ। कोई कहता — पयनिधि (क्षीरसागर) में बसते प्रभु वही।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
The gods sat deliberating: 'Where can we find the Lord to make our appeal? Some said to go to Vaikuntha; others said the Lord dwells in the Ocean of Milk.'
Chaupai2 / 5
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती।। तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।।
हिन्दी अर्थ देखें
(शिवजी ने कहा) जिसके हृदय में जैसी भक्ति, जैसी प्रीति — प्रभु वहाँ प्रकट — सदा उसी रीति (ढंग) से। उस समाज में, गिरिजा! मैं रहा। अवसर पाकर एक वचन कहा।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Whoever has whatever devotion and love in their heart — the Lord manifests there, always, in that manner.' At that gathering, O Girija, I was present. Finding the right moment, I spoke one word:
Chaupai3 / 5
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।। देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।।
हिन्दी अर्थ देखें
(शिवजी ने कहा) श्रीहरि व्यापक (सर्वव्यापी), सर्वत्र समान। प्रेम से प्रकट होते — मैं जानता हूँ। देश, काल, दिशा, विदिशा में — कहो, कहाँ प्रभु नहीं?
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Hari is all-pervading, equally present everywhere; through love alone He manifests — this I know. In every direction, every quarter, and every place — tell me, where is the Lord not?'
Chaupai4 / 5
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।। मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।।
हिन्दी अर्थ देखें
(शिवजी ने कहा) अग (स्थावर) और जगमय (जंगम) — सब में व्याप्त — रहित (अलिप्त), विरागी। प्रेम से प्रभु प्रकट होते — जैसे अग्नि (लकड़ी में छिपी)। मेरा वचन सबके मन को माना — 'साधु-साधु' कहकर ब्रह्मा ने बखाना (प्रशंसा की)।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'The animate and inanimate are all pervaded by Him, yet He remains detached. Through love, the Lord manifests, just as fire emerges from within.' My words were accepted by all; Brahma praised them saying 'Well said, well said!'
Doha5 / 5
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर। अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर।।185।।
हिन्दी अर्थ देखें
सुनकर विरञ्चि (ब्रह्मा) के मन में हर्ष — तन पुलकित, नयनों से नीर (जल) बहा। हाथ जोड़कर, सावधान, मतिधीर (स्थिर बुद्धि) — स्तुति करने लगे।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
Hearing this, joy arose in Brahma's heart; his body thrilled and tears flowed from his eyes. Joining his palms, the firm-minded one began to offer praise with full attention.

Read this doha in English →