बालकाण्ड

दोहा 186

5 पद

Chhand1 / 5
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता। गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता।। पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई। जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई।।
हिन्दी अर्थ देखें
जय-जय सुरनायक (देवताओं के नायक)! जन-सुखदायक! प्रणतपाल (शरणागत-रक्षक) भगवन्त! गो-द्विज-हितकारी! जय असुरारि (असुर-शत्रु)! सिन्धुसुता (लक्ष्मी) के प्रिय कान्त (पति)! पालन — सुर (देवता), धरनी (पृथ्वी) का। अद्भुत करनी — मर्म (रहस्य) कोई नहीं जानता। जो सहज कृपालु, दीनदयालु — वही अनुग्रह (कृपा) करें। जय-जय अविनाशी! सब घट (हृदय) में वासी! व्यापक, परमानन्द! अविगत (अज्ञेय), गोतीत (इन्द्रियातीत), चरित पुनीत (पवित्र)! मायारहित, मुकुन्द! जिनके लिए विरागी, अत्यन्त अनुरागी, विगतमोह (मोह-रहित) मुनिवृन्द — रात-दिन ध्यावते (ध्यान करते), गुणगण गावते — जयति सच्चिदानन्द! जिसने सृष्टि उपजाई — त्रिविध (तीन प्रकार की) बनाई — संग सहाय न दूजा। वही अघारि (पाप-शत्रु) हमारी चिन्ता करें — (उन्हें) भक्ति जानिए, न पूजा (चाहिए)। जो भव-भय-भंजन (संसार-भय नाशक), मुनि-मन-रंजन (मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले), विपत्ति-बरूथ (समूह) गंजन (नाशक)। मन-वचन-कर्म (से) वाणी — छोड़कर सयानी (चतुराई) — शरण सकल सुर-जूथ (देवता-समूह)। शारदा (सरस्वती), श्रुति (वेद), शेष, ऋषि अशेष (सभी) — जिन्हें कोई नहीं जाना। जिन्हें दीन प्यारे — वेद पुकारते — द्रवें (कृपा करें) वे श्रीभगवान। भव-वारिधि (संसार-सागर) मन्दर (मन्थन-पर्वत), सब विधि सुन्दर, गुणमन्दिर (गुणों के मन्दिर), सुखपुंज (सुख-राशि)। मुनि, सिद्ध, सकल सुर — परम भयातुर (भयभीत) — नमते नाथ के पद-कंज (चरण-कमल)।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
Glory, glory to the Lord of gods, giver of joy to devotees, protector of the humble, O Lord! Benefactor of cows and Brahmins, glory to the slayer of demons, beloved husband of Lakshmi! Protector and sustainer of gods and earth, performer of wondrous deeds whose mystery none can know — may that naturally compassionate, merciful-to-the-meek Lord bestow His grace! Glory, glory to the imperishable, all-pervading, infinite Lord!
Chhand2 / 5
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा। अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा।। जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह मुनिबृंदा। निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।।
Chhand3 / 5
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा। सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।। जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा। मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा।।
Chhand4 / 5
सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहि जाना। जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।। भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा। मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा।।
Doha5 / 5
जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह। गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह।।186।।
हिन्दी अर्थ देखें
सुर-भूमि (देवता-पृथ्वी) को भयभीत जानकर — स्नेह-समेत वचन सुनकर। गगनगिरा (आकाशवाणी) गम्भीर हुई — शोक-सन्देह हरने वाली।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
Knowing the gods and Earth to be afraid, and hearing their words full of love, a deep voice resounded from the sky, dispelling all grief and doubt.

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