बालकाण्ड
दोहा 189
5 पद
Chaupai1 / 5
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।।
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला।।
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एक बार भूपति (राजा) के मन में — ग्लानि (दुख) हुई — मेरे पुत्र नहीं। तुरन्त महीपाल (राजा) गुरु-गृह (गुरु के घर) गया — चरणों में लगकर विशाल (बहुत) विनय की।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Once the king felt sorrow in his heart that he had no sons. The king immediately went to his guru's house, touched his feet, and made humble entreaty at length.
Chaupai2 / 5
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ।।
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी।।
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अपना दुख-सुख सब गुरु को सुनाया — (गुरु) वसिष्ठ ने बहु विधि समझाया। (कहा) धीरज धरो — चार पुत्र होंगे — त्रिभुवन (तीनों लोकों) में विदित (प्रसिद्ध), भक्तों के भय हरने वाले।
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He told his guru all his sorrows and joys. Vasishtha comforted him in many ways: 'Be patient — you shall have four sons, famed throughout the three worlds, who shall dispel the fear of devotees.'
Chaupai3 / 5
सृंगी रिषहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा।।
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें।।
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श्रृंगी ऋषि को वसिष्ठ ने बुलवाया — पुत्रकाम (पुत्र-प्राप्ति हेतु) शुभ यज्ञ करवाया। भक्ति सहित मुनि ने आहुति दी — अग्नि (अग्निदेव) प्रकट हुए — चरु (हवन-सामग्री) हाथ में लिए।
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Vasishtha summoned the sage Shringi and had him perform the auspicious Putrakameshti sacrifice (fire sacrifice for sons). When the sage offered oblations with devotion, the Fire-god appeared holding the sacred offering in his hands.
Chaupai4 / 5
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा।।
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई।।
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(अग्निदेव ने कहा) जो वसिष्ठ ने हृदय में विचारा — सकल काज तुम्हारा सिद्ध हुआ। यह हवि (हवन-प्रसाद) बाँटकर नृप (राजा) को दो जाकर — जिसे जैसा योग्य भाग बनाकर।
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'Whatever Vasishtha conceived in his heart — O King, your entire purpose has been accomplished. Distribute this sacred food and give it to the queens, apportioning each her rightful share.'
Doha5 / 5
तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।।
परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ।।189।।
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तब पावक (अग्निदेव) सकल सभा को समझाकर — अदृश्य हुए। परमानन्द-मग्न नृप (राजा) — हर्ष हृदय में समाता नहीं।
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Then the Fire-god became invisible, having explained everything to the assembly. The king was immersed in supreme bliss; his heart could not contain his joy.