बालकाण्ड
दोहा 192
5 पद
Chhand1 / 5
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।
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कृपालु, दीनदयालु प्रकट हुए — कौसल्या-हितकारी। हर्षित महतारी (माता) — मुनि-मन-हारी — अद्भुत रूप विचारी (देखकर)। लोचन (नेत्र) अभिराम (सुन्दर), तनु (शरीर) घनश्याम (मेघ-जैसा साँवला) — निज आयुध (हथियार) चार भुजाओं में। भूषण (आभूषण), वनमाला, नयन विशाल — शोभासिन्धु (सौन्दर्य-सागर), खरारि (खर-राक्षस के शत्रु)। (कौसल्या ने कहा) दो हाथ जोड़कर — आपकी स्तुति किस विधि करूँ, अनन्त! माया, गुण, ज्ञानातीत (ज्ञान से परे), अमान (अभिमान-रहित) — वेद-पुराण भनन्त (कहते)। करुणा-सुख-सागर, सब गुणों के आगर (भण्डार) — जिन्हें गाते श्रुति (वेद)-सन्त। वही मेरे हित — जन-अनुरागी (भक्तों को प्रेम करने वाले) — श्रीकान्त (लक्ष्मीपति) प्रकट हुए। ब्रह्माण्ड-निकाय (समूह) — निर्मित माया — रोम-रोम प्रति (में) वेद कहते। मेरे उर (हृदय) में वही बासी (निवास करने वाले) — यह उपहासी (हास्यास्पद) — सुनत (सुनकर) धीर (धैर्यवान) पति भी स्थिर नहीं रहते। ज्ञान उपजा तब — प्रभु मुस्कुराए — बहुत विधि चरित्र करना चाहते। सुहावनी कथा कहकर माता को बुझाई (समझाया) — जिस प्रकार सुत (पुत्र) का प्रेम लहे (पाए)। माता फिर बोली — (कहा) वह मति (बुद्धि) डोली (बदली) — तात! यह रूप (चतुर्भुज) त्यागो। शिशु-लीला करो — अत्यन्त प्रियशील — यह सुख परम अनूप (अनुपम)। सुजान (बुद्धिमान) के वचन सुनकर — रोदन (रोना) ठाना — सुरभूप (देवताओं के राजा) बालक हो गए। यह चरित्र जो गावें (गाते) — हरि-पद (श्रीहरि का पद) पावें — वे भवकूप (संसार-कूप) में नहीं गिरते।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
The merciful Lord, compassionate to the lowly, benefactor of Kausalya, appeared. The mother was overjoyed, and sages' minds were captivated beholding His wondrous form. His eyes were enchanting, His body dark as a cloud, and He bore His own weapons in four arms. Adorned with ornaments and a garland of forest flowers, with large eyes, He was an ocean of beauty, the slayer of demon Khara. With joined palms, the mother spoke in praise...
Chhand2 / 5
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।।
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।
Chhand3 / 5
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै।।
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।।
Chhand4 / 5
माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।
Doha5 / 5
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।192।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
विप्र (ब्राह्मण), धेनु (गाय), सुर (देवता), सन्त-हित — लीन्ह मनुज (मानव) अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु (शरीर) — माया-गुण (त्रिगुण) से गो (इन्द्रिय) पार (परे)।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
For the sake of Brahmins, cows, gods, and saints, He took a human incarnation. He fashioned His body by His own will — beyond Maya and the three gunas.