बालकाण्ड
दोहा 196
5 पद
Chaupai1 / 5
यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत गुनगाना।।
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा।।
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यह रहस्य किसी ने नहीं जाना। दिनमणि (सूर्य) गुणगान करते चले। महोत्सव देखकर सुर (देवता), मुनि, नाग — अपना भाग्य वर्णन करते भवन (लोक) चले।
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No one knew this mystery. The Sun proceeded on his way singing the Lord's praises. Seeing the great festival, gods, sages, and Nagas returned to their abodes, extolling their own good fortune.
Chaupai2 / 5
औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी।।
काक भुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ।।
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(शिवजी ने कहा) और एक अपनी चोरी (रहस्य) कहता हूँ — सुनो, गिरिजा! अत्यन्त दृढ़ मति (बुद्धि) तुम्हारी। काकभुशुण्डि — हम दोनों साथ — मनुज-रूप (मानव-रूप) में — कोई नहीं जानता।
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I shall tell you yet another secret of mine — listen, O Girija, with your firm mind. Kakabhushundi and I — we two were there together in human form, and no one recognized us.
Chaupai3 / 5
परमानंद प्रेमसुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले।।
यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई।।
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परमानन्द, प्रेम-सुख से फूले — गलियों में फिरते, मग्न मन, भूले (तल्लीन)। यह शुभ चरित्र वही जानता — जिस पर श्रीराम की कृपा होती।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Blooming with supreme bliss and the joy of love, we wandered through the streets with minds entranced. Only that person knows this blessed story upon whom Rama's grace descends.
Chaupai4 / 5
तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा।।
गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा।।
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उस अवसर पर जो जिस विधि आया — भूप (राजा) ने जो जिसके मन भाया (वह दिया)। गज (हाथी), रथ, तुरग (घोड़ा), हेम (सोना), गो (गाय), हीरा — नृप ने नाना विधि (प्रकार) के चीर (वस्त्र) दिए।
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At that time, whoever came in whatever manner, the king gave them whatever their heart desired. Elephants, chariots, horses, gold, cows, diamonds — the king gave garments of every kind.
Doha5 / 5
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहि असीस।
सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस।।196।।
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सबके मन सन्तोषे (सन्तुष्ट किए) — जहाँ-तहाँ आशीर्वाद देते। (कहते) सकल तनय (पुत्र) चिरजीवी हों — तुलसीदास के ईश (ईश्वर)!
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He satisfied the hearts of all, and from everywhere came blessings: 'May all the sons live long — they who are the lords of Tulsidas!'