बालकाण्ड

दोहा 231

5 पद

Chaupai1 / 5
तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई।। पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ फुलवाई।।
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(श्रीराम ने कहा) तात! जनकतनया (जनक-पुत्री) यह वही — जिसके कारण धनुषयज्ञ होता। गौरी पूजन सखियों को लेकर आई — प्रकाश करती (फैलाती) फुलवाई (फुलवारी) में फिरती।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Brother, this is the very daughter of Janaka, for whose sake the bow-sacrifice is being held. She has come with her companions to worship Gauri, and now walks through the garden, spreading radiance.'
Chaupai2 / 5
जासु बिलोकि अलोकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा।। सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता।।
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(श्रीराम ने कहा) जिसकी अलौकिक शोभा देखकर — मेरा सहज पुनीत (पवित्र) मन छोभा (क्षुब्ध हुआ)। वह सब कारण विधाता (ब्रह्मा) जानता। सुनो, भ्राता! शुभद (शुभ) अंग फड़कते।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Beholding her extraordinary beauty, my naturally pure mind is agitated. The Creator knows the cause of all this. Listen, brother — my auspicious limbs are throbbing.'
Chaupai3 / 5
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।। मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी।।
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(श्रीराम ने कहा) रघुवंशियों का सहज स्वभाव — मन कुपन्थ (बुरे मार्ग) पर कभी पैर नहीं धरता। मुझे मन की अतिशय प्रतीति (विश्वास) — जिन्होंने सपने में भी परनारी (दूसरे की स्त्री) नहीं देखी।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'It is the innate nature of the Raghu dynasty that the mind never treads a wrong path. I have this absolute conviction in my heart — one who has never looked at another's wife, even in a dream.'
Chaupai4 / 5
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी।। मंगन लहहि न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं।।
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(श्रीराम ने कहा) जिनकी रण (युद्ध) में रिपु (शत्रु) पीठ (पीठ = भागना) नहीं पाते। पर-तिय (दूसरे की स्त्री) पर मन-दृष्टि नहीं डालते। माँगने वालों (याचकों) को 'नहीं' नहीं मिलती — ऐसे नरवर (श्रेष्ठ पुरुष) जग में थोड़े।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Those whose backs the enemy never sees in battle, who never cast their eyes or minds upon another's wife, from whom supplicants never go away empty-handed — such noble men are rare in this world.'
Doha5 / 5
करत बतकहि अनुज सन मन सिय रूप लोभान। मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान।।231।।
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अनुज (छोटे भाई) से बतकही (बातें) करते — मन सीता-रूप में लोभित (मोहित)। मुख-सरोज (कमल-मुख) के मकरन्द (पराग)-छबि (सौन्दर्य) — मधुप (भौंरे) जैसे पान (रसपान) करते।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
While talking thus with his brother, Rama's mind was captivated by Sita's beauty. Like a bee, he drank in the nectar of the beauty of her lotus face.

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