बालकाण्ड
दोहा 234
5 पद
Chaupai1 / 5
धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी।।
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू।।
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धीरज धरकर एक सयानी (बुद्धिमान) आली (सखी) — पाणि (हाथ) पकड़कर सीता से बोली। (कहा) पहले गौरी का ध्यान करो — फिर भूपकिशोर (राजकुमार) देख लेना।
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Gathering her courage, one wise companion took Sita's hand and said, 'First complete your meditation on Gauri; then you can look at the princes.'
Chaupai2 / 5
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे।।
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा।।
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सकुचाकर सीता ने तब नयन (आँखें) उघारे (खोले) — सन्मुख दोनों रघुसिंह (रघुवंश-सिंह) निहारे (देखे)। नख (पैर) से शिख (शिखा) तक राम की शोभा देखकर — पिता का पण (प्रतिज्ञा) स्मरण करके मन अत्यन्त क्षुब्ध।
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Bashfully, Sita then opened her eyes and beheld the two lions of the Raghu clan standing before her. Seeing Rama's beauty from head to toe and remembering her father's vow, her mind was greatly troubled.
Chaupai3 / 5
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहि सभीता।।
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली।।
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जब सखियों ने सीता को परवश (विवश) देखा — (कहा) बहुत देर हो गई — सब भयभीत कहतीं। (कहा) फिर आएँगे इसी बेरिया (समय) काल्हि (कल) — ऐसा कहकर एक आली (सखी) मन में हँसी।
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When the companions saw Sita helplessly lost in love, they all said anxiously, 'It is getting late.' 'We shall come again at this very hour tomorrow,' said one companion, smiling inwardly.
Chaupai4 / 5
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी।।
धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि अपनपउ पितुबस जाने।।
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गूढ़ (गहन) गिरा (वाणी) सुनकर सीता सकुचाईं — विलम्ब हुआ — माता का भय माना। बड़ा धीरज धरकर राम को उर (हृदय) में लाईं — फिरकर (लौटकर) अपनापन (अपनी स्थिति) पितृवश (पिता के अधीन) जाना।
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Hearing this veiled speech, Sita felt shy. Fearing her mother's displeasure at the delay, she summoned great courage, drew Rama into her heart, and turned away, knowing herself bound by her father's will.
Doha5 / 5
देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि।। 234।।
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मृग (हिरन), विहंग (पक्षी), तरु (वृक्ष) देखने के बहाने — बार-बार फिरतीं (लौटतीं)। निरखि-निरखि (बार-बार देखकर) रघुवीर-छबि (सौन्दर्य) — प्रीति थोड़ी नहीं बढ़ती (अर्थात् बहुत बढ़ती)।
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Under the pretext of looking at deer, birds, and trees, she turned back again and again. Gazing repeatedly at the beauty of the hero of the Raghus, her love only kept growing.