बालकाण्ड
दोहा 236
6 पद
Chaupai1 / 6
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी।।
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।
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(सीता ने कहा) आपकी सेवा से सुलभ चार फल (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष)। वरदायिनी! पुरारि (शिव)-पिआरी (प्रिय)! देवी! आपके पद-कमल पूजकर — सुर (देवता), नर (मनुष्य), मुनि — सब सुखी होते।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'By serving you, the four fruits of life are easily obtained, O bestower of boons, O beloved of Lord Shiva. O Goddess, by worshipping your lotus feet, gods, men, and sages all find happiness.'
Chaupai2 / 6
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें।।
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।।
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(सीता ने कहा) मेरा मनोरथ (इच्छा) अच्छी तरह जानती हो — सबके उर (हृदय)-पुर (नगर) में सदा बसती हो। प्रकट नहीं किया — उसी कारण (लज्जा-वश)। ऐसा कहकर बैदेही (सीता) ने चरण पकड़े।
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'You know well the desire of my heart; may you dwell forever in the heart-city of all. I have not stated my wish openly for that very reason.' So saying, the princess of Videha clasped her feet.
Chaupai3 / 6
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।।
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विनय-प्रेम वश भवानी (पार्वती) हुईं — माला खसी (गिरी), मूर्ति मुस्कुराई। सीता ने सादर प्रसाद (माला) सिर पर धरा — गौरी बोलीं — हृदय में हर्ष भरकर।
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Overcome by Sita's devotion and love, Bhavani was pleased — the garland fell from the image, and it smiled. Sita reverently placed the blessed offering on her head, and Gauri spoke, her heart brimming with joy.
Chaupai4 / 6
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।।
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(गौरी ने कहा) सुनो, सीता! हमारी सत्य आशीष (आशीर्वाद) — मन-कामना तुम्हारी पूजिहि (पूरी होगी)। नारद-वचन सदा शुचि (पवित्र) और सच्चा — जिसमें मन राचा (रमा) — वह वर (पति) मिलेगा।
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'Listen, Sita, my blessing is true: the desire of your heart shall be fulfilled. Narada's words are ever pure and true — you shall obtain the groom on whom your heart is set.'
Chhand5 / 6
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो।।
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली।।
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(गौरी ने कहा) मन जिसमें राचा (लगा) — वह वर मिलेगा — सहज सुन्दर साँवरा। करुणानिधान, सुजान (बुद्धिमान) — शील (सदाचार) और स्नेह (प्रेम) जानते — आपका। इस भाँति गौरी की आशीष सुनकर सीता सहित हृदय में हर्षित हुईं आली (सखियाँ)। तुलसी (कहते हैं) — भवानी को पूजकर बार-बार — मुदित (प्रसन्न) मन मन्दिर (घर) चलीं।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
The one on whom your heart is set — that naturally handsome, dark-complexioned groom — you shall obtain him. He is an ocean of mercy, wise, and knows well your virtue and love. Hearing Gauri's blessing thus, Sita and all her friends were delighted at heart. Tulsi says, after worshipping Bhavani again and again, she returned joyfully to her home.
Soratha6 / 6
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे।।236।।
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गौरी को अनुकूल जानकर — सीता के हृदय का हर्ष कहा नहीं जाता। मंजुल (सुन्दर) मंगल-मूल (शुभ-संकेत) — बाम (बायें) अंग फड़कने लगे।
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Knowing Gauri to be favorable, Sita's heart was filled with inexpressible joy. Auspicious and blissful omens appeared — her left limbs began to throb.