बालकाण्ड
दोहा 267
5 पद
Chaupai1 / 5
बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू।।
जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही।।
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(सज्जन राजाओं ने कहा) बैनतेय (गरुड़) का बलि (शिकार) जैसे काग (कौआ) चाहे। ससु (खरगोश) जैसे नाग-अरि (गरुड़) का भागू (हिस्सा) चाहे। अकारण कोही (क्रोधी) जैसे कुशल (शान्ति) चाहे। सब सम्पदा शिवद्रोही (शिव-विरोधी) चाहे।
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'A crow coveting the prey of Garuda, a hare challenging the enemy of serpents, a perpetually angry person seeking well-being, an enemy of Shiva desiring all prosperity —'
Chaupai2 / 5
लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई।।
हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा।।
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(सज्जन राजाओं ने कहा) लोभी, लोलुप (लालची) कल (सुन्दर) कीर्ति (यश) चाहे। अकलंकता (निष्कलंकता) क्या कामी (कामुक) पाए? हरि-पद-विमुख (श्रीहरि से विमुख) परम गति (मोक्ष) चाहता। वैसा ही तुम्हारा लालच, नरनाह (राजाओं)!
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'A greedy, lustful man desiring noble fame, a sensualist hoping for spotless honor, one hostile to Hari's feet yet craving the highest state — such, O kings, is your vain desire.'
Chaupai3 / 5
कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी।।
रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं।।
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कोलाहल सुनकर सीता डरीं — सखियाँ लवाकर (साथ लेकर) रानी-पास गईं। राम सुभाव (सहज) ही गुरु-पास चले — सीता-स्नेह मन में वर्णन करते।
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Sita was frightened by the uproar, and her companions led her away to the queen. Rama walked calmly back toward the guru, describing Sita's love within his heart.
Chaupai4 / 5
रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया।।
भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं।।
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रानियों सहित सोचवश (चिन्तित) सीता — (सोचतीं) अब धौं (आखिर) विधि (भाग्य) को क्या करना है? भूपों (राजाओं) के वचन सुनकर इत-उत (इधर-उधर) ताकते — लक्ष्मण-राम के डर से बोल नहीं सकते।
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Sita along with the queens was lost in worry — 'What will fate do now?' The kings heard the threats and looked this way and that; awed by Lakshmana and Rama, they dared not speak.
Doha5 / 5
अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।
मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप।।267।।
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अरुण (लाल) नयन (नेत्र), भृकुटी (भौंहें) कुटिल (तिरछी) — नृपों (राजाओं) को सक्रोध (क्रोधपूर्वक) देखते। मानो मत्त (मस्त) गजगण (हाथी-समूह) निरखकर (देखकर) — सिंहकिशोर (सिंह-शावक) को चोप (उत्साह)।
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With red eyes and knitted brows, Lakshmana glared at the kings in anger — like a young lion cub eagerly watching a herd of maddened elephants.