बालकाण्ड
दोहा 278
5 पद
Chaupai1 / 5
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।।
टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने।।
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(लक्ष्मण ने कहा) मैं आपका अनुचर (सेवक), मुनिराय! कोप परिहरकर (छोड़कर) अब दया करो। टूटा चाप (धनुष) — रिसाने (क्रोधित होने) से नहीं जुड़ेगा। बैठो — (नहीं तो) पैर पिराने (दुखेंगे)।
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'I am your servant, O great sage. Abandon your anger and show mercy now. The broken bow cannot be joined again by being angry; please sit down, or your feet will ache from standing.'
Chaupai2 / 5
जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई।।
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं।।
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(लक्ष्मण ने कहा) यदि अत्यन्त प्रिय — तो उपाय करो — कोई बड़ा गुनी (कारीगर) बुलाकर जोड़ो। लक्ष्मण के बोलते जनक डरे — (जनक ने कहा) मष्ट (चुप) करो — अनुचित, भला नहीं।
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'If the bow is so dear to you, then arrange a remedy — summon some great craftsman to repair it.' At Lakshmana's words, Janaka trembled and said, 'Be quiet — this is most improper.'
Chaupai3 / 5
थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी।।
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी।।
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थर-थर काँपते पुर (नगर) नर-नारी — (कहते) छोटा कुमार — खोट (शरारत) बड़ी भारी। भृगुपति (परशुराम) — निर्भय वाणी सुन-सुनकर — रिस (क्रोध) से तन जलता — बल-हानि होती।
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The men and women of the city trembled in terror. 'This little prince is terribly naughty.' Hearing the fearless words again and again, Parashurama burned with rage while his strength ebbed away.
Chaupai4 / 5
बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।।
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं।।
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(परशुराम ने) राम को निहोरा (विनती) देकर कहा — (कहा) तुम्हारे लघु (छोटे) बन्धु (भाई) विचारकर बचाता हूँ। मन मलीन (गन्दा) — तन सुन्दर कैसे? — विष-रस भरा कनक (सोने का) घट (बर्तन) जैसे।
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He addressed Rama with an appeal, 'I spare your brother only because he is young. His mind is foul though his body is fair — like a golden pot filled with poison.'
Doha5 / 5
सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम।।278।।
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सुनकर लक्ष्मण फिर हँसे — राम ने नयन (आँखें) तरेरे (घूरकर देखा)। सकुचाकर (संकोच से) गुरु-समीप गए — बाम (उलटी/उत्तेजक) वाणी छोड़कर।
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Hearing this, Lakshmana laughed; then Rama glared at him sternly. Abashed, Lakshmana went and sat near the guru, abandoning his provocative speech.