बालकाण्ड
दोहा 285
5 पद
Chaupai1 / 5
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु।।
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी।।
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(परशुराम ने कहा) जय रघुवंश-बनज (कमल)-बन (वन)-भानु (सूर्य)! गहन (घना) दनुज (राक्षस)-कुल दहन (जलाने वाली) कृसानु (अग्नि)! जय सुर (देवता)-विप्र (ब्राह्मण)-धेनु (गाय)-हितकारी! जय मद-मोह-कोह (क्रोध)-भ्रम-हारी (नाशक)!
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'Victory to you, O sun to the lotus-forest of the Raghu dynasty! O blazing fire consuming the dense forest of the demon race! Victory, O benefactor of gods, Brahmins, and cows! Victory, O destroyer of pride, delusion, anger, and confusion!'
Chaupai2 / 5
बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर।।
सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा।।
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(परशुराम ने कहा) विनय, शील, करुणा, गुण — सागर। जयति! वचन-रचना अत्यन्त नागर (चतुर)। सेवक-सुखद — सुभग सब अंग। जय! शरीर-छबि (सौन्दर्य) कोटि अनंग (करोड़ों कामदेवों को लजाने वाली)।
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'O ocean of humility, virtue, compassion, and goodness! Victory! Your speech is supremely eloquent. O giver of happiness to your servants, beautiful in every limb! Victory, whose bodily splendor surpasses millions of Kamadevas!'
Chaupai3 / 5
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा।।
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता।।
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(परशुराम ने कहा) एक मुख से प्रशंसा कैसे करूँ? जय महेश (शिव)-मन-मानस (सरोवर) के हंस! अज्ञानी (होकर) बहुत अनुचित कहा — क्षमा करो, क्षमा-मन्दिर (क्षमा के मन्दिर) — दोनों भ्राता!
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'With but one mouth, what praise can I offer? Victory, O swan sporting on the Manasa lake of Mahesha's mind! I have spoken much that was unseemly in my ignorance — forgive me, O two brothers, abode of forgiveness.'
Chaupai4 / 5
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।।
अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने।।
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'जय-जय-जय रघुकुलकेतु (रघुवंश-ध्वज)!' कहकर भृगुपति (परशुराम) तप हेतु वन गए। अपभय (व्यर्थ भय) से कुटिल (दुष्ट) महीप (राजा) डराए (डरे) — जहाँ-तहाँ कायर गवँहि (लौटकर) भागे।
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Crying 'Victory, victory, victory to the banner of the Raghu clan!' Bhrigu's lord departed for the forest to perform penance. The wicked, scheming kings were now terrified; cowards fled here and there in all directions.
Doha5 / 5
देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल।।285।।
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देवताओं ने दुन्दुभी (नगाड़े) दीं — प्रभु पर फूल बरसाते। पुर (नगर) नर-नारी सब हर्षित — मोहमय (मोह-जनित) शूल (कष्ट) मिटी।
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The gods beat their drums and rained flowers upon the Lord. All the men and women of the city rejoiced; the thorn of delusion-born anguish was removed.