बालकाण्ड
दोहा 295
5 पद
Chaupai1 / 5
राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।।
सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं।।
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राजा ने सब रनिवास (अन्तःपुर) बुलाकर — जनक-पत्रिका (पत्र) पढ़कर सुनाई। सन्देश सुनकर सब हर्षित हुईं — अपर (शेष) कथा सब भूप (राजा) ने बखानी।
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The king summoned the entire inner court and read Janaka's letter aloud to all. Hearing the message, all the queens were delighted, and the king narrated the rest of the story.
Chaupai2 / 5
प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बनी।।
मुदित असीस देहिं गुरु नारीं। अति आनंद मगन महतारीं।।
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प्रेम-प्रफुल्लित (प्रसन्न) राजा-रानी शोभित — मानो शिखिनी (मोरनी) बारिद (बादल) बानी (ध्वनि) सुनकर। मुदित (प्रसन्न) गुरु-नारियाँ (गुरु-पत्नियाँ) आशीर्वाद देतीं — माताएँ अत्यन्त आनन्द-मग्न।
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The king and queens blossomed with love like peahens hearing the thundering rain clouds. The guru's wives joyfully gave blessings, and the mothers were immersed in supreme bliss.
Chaupai3 / 5
लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती।।
राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी।।
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परस्पर अत्यन्त प्रिय पाती (पत्र) लेतीं — हृदय से लगाकर छाती जुड़ाती (शीतल करतीं)। राम-लक्ष्मण की कीर्ति (यश)-करनी (कर्म) — बार-बार भूपवर (श्रेष्ठ राजा) वर्णन करते।
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They received the dear letters and pressed them to their hearts, soothing their bosoms. Again and again, the great king described the fame and deeds of Rama and Lakshmana.
Chaupai4 / 5
मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए।।
दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता।।
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मुनि-प्रसाद (कृपा) कहकर द्वार (बाहर) गए। रानियों ने तब महीदेव (ब्राह्मण) बुलाए। आनन्द समेत दान दिए — विप्रवर (श्रेष्ठ ब्राह्मण) आशीर्वाद देते चले।
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Attributing everything to the sage's grace, the king went to the gate. The queens then summoned the Brahmins, who gave generous gifts in their joy and departed giving blessings.
Soratha5 / 5
जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।
चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के।।295।।
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याचकों को बुलाकर — कोटि (करोड़ों) विधि (प्रकार) निछावरी दीं। (कहते) चिर (दीर्घकाल) जीवें चक्रवर्ती दशरथ के चारों सुत!
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Calling the supplicants, they showered gifts upon them in countless ways. "Long live the four sons of Emperor Dasharatha!"