बालकाण्ड
दोहा 317
6 पद
Chaupai1 / 6
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा।।
संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे।।
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जिस श्रेष्ठ बाजि (घोड़े) पर राम असवार (सवार) — उसे शारद (सरस्वती) भी वर्णन नहीं कर सकतीं। शंकर (शिव) राम-रूप में अनुरागे — पन्द्रह नयन (नेत्र) अत्यन्त प्रिय लगे (कम पड़ गए)।
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The splendid horse on which Rama rode—even Sharada cannot describe it fully. Shankara was so enamored of Rama's beauty that his fifteen eyes seemed too few.
Chaupai2 / 6
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे।।
निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने।।
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हरि (विष्णु) ने हित (प्रेम) सहित जब राम देखे — रमा (लक्ष्मी) समेत रमापति (विष्णु) मोहित। राम-छबि निरखकर विधि (ब्रह्मा) हर्षित — आठ ही नयन (आँखें) जानकर पछताए।
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When Vishnu gazed lovingly at Rama, both Lakshmi and her Lord were enchanted. Beholding Rama's beauty, Brahma was delighted, yet regretted having only eight eyes.
Chaupai3 / 6
सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू।।
रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना।।
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सुर-सेनप (इन्द्र) के उर (हृदय) में बहुत उछाह (उत्साह) — विधि (ब्रह्मा) से डेढ़ गुना लोचन (नेत्र)-लाभ। राम को देखते सुरेश (इन्द्र) सुजान (बुद्धिमान) — गौतम-शाप परम हित (लाभकारी) माना।
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The Commander of the gods had great joy in his heart; he had one-and-a-half times more eyes than Brahma. The wise Indra gazed at Rama and considered Gautama's curse a supreme blessing.
Chaupai4 / 6
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं।।
मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी।।
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सब देव सुरपति (इन्द्र) से सिहाते (ईर्ष्या करते) — (कहते) आज पुरन्दर (इन्द्र)-सम कोई नहीं। मुदित (प्रसन्न) देवगण राम देखकर। नृपसमाज — दोनों (ओर) विशेष हर्ष।
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All the gods envied Indra: "Today none is equal to Indra!" The hosts of gods were delighted seeing Rama; both the wedding parties rejoiced greatly.
Chhand5 / 6
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी।
बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी।।
एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।
रानि सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं।।
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अत्यन्त हर्ष — दोनों ओर राजसमाज — बहुत घनी दुन्दुभियाँ (नगाड़े) बजतीं। सुमन (फूल) बरसाते सुर (देवता) हर्षित — 'जय-जयति-जय रघुकुलमणि!' कहकर। इस भाँति बारात आती जानकर — बहुत बाजने बजते। रानी सुवासिनी (सुहागिनों) को बुलाकर — परिछन (आरती) हेतु मंगल सजातीं।
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Great joy filled both the wedding parties, and drums resounded abundantly on both sides. The gods showered flowers, joyfully proclaiming: "Victory, victory, victory to the jewel of the Raghu clan!" In this manner, knowing the procession was arriving, many musical instruments were played. The queen summoned the married women to prepare for the welcoming ceremony.
Doha6 / 6
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।
चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि।।317।।
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अनेक विधि आरती सजाकर — सकल मंगल सँवारकर। मुदित (प्रसन्न) परिछन (आरती) करने चलीं — गजगामिनी (हाथी-चाल वाली) श्रेष्ठ नारियाँ।
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Preparing the auspicious plate in many ways, arranging all the auspicious items, the noble women went forth joyfully, walking with the grace of elephants, to perform the welcoming ceremony.