बालकाण्ड
दोहा 321
6 पद
Chaupai1 / 6
बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।।
कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई।।
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फिर कोसलपति (दशरथ) की पूजा की — ईश (ईश्वर)-सम जानकर — दूजा (दूसरा) भाव नहीं। हाथ जोड़कर विनय-बड़ाई (प्रशंसा) की — निज भाग्य-विभव (वैभव) बहुतायत कहकर।
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Then Janaka worshipped the King of Kosala, regarding him as equal to God, with no sense of difference. With folded hands, he praised him and spoke at length of his own good fortune and glory.
Chaupai2 / 6
पूजे भूपति सकल बराती। समधि सम सादर सब भाँती।।
आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मूख एक उछाहू।।
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भूपति (जनक) ने सकल बारातियों की पूजा की — समधी (ससुर)-सम सादर, सब भाँति। सबको उचित आसन दिए — एक मुख (मुँह) से उछाह (उत्साह) कैसे कहूँ?
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The king honored all the wedding guests as he would wedding-hosts—respectfully, in every way. He gave appropriate seats to everyone; how can a single mouth express all the joy?
Chaupai3 / 6
सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी।।
बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ।।
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सकल बारात की जनक ने सम्मान की — दान, मान (सम्मान), विनती, श्रेष्ठ वाणी। विधि (ब्रह्मा), हरि (विष्णु), हर (शिव), दिशिपति (दिक्पाल), दिनराऊ (सूर्य) — जो रघुवीर-प्रभाव जानते।
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Janaka honored the entire wedding party with gifts, respect, humble words, and fine speech. Brahma, Vishnu, Shiva, the guardians of the directions, and the sun—all who knew Rama's true power—
Chaupai4 / 6
कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ।।
पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें।।
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कपट (छद्म) — श्रेष्ठ विप्र-वेष (ब्राह्मण-वेश) बनाकर — कौतुक (तमाशा) देखते, अत्यन्त सुख पाकर। जनक ने देव-सम जानकर पूजा की — बिना पहचाने सुन्दर आसन दिए।
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—disguised as distinguished Brahmins, watched the spectacle with great delight. Janaka worshipped them thinking them great sages, and gave them fine seats without recognizing them.
Chhand5 / 6
पहिचान को केहि जान सबहिं अपान सुधि भोरी भई।
आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँद मई।।
सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए।
अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए।।
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कौन पहचाने किसे — सबको अपनी सुधि (होश) भोरी (भूली) हुई। आनन्दकन्द (आनन्द-मूल) दूल्हे को देखकर — दोनों ओर आनन्दमय। सुर (देवताओं) को राम सुजान (बुद्धिमान) ने देखा — पूजा की — मानसिक (मन से) आसन दिए। शील-स्वभाव प्रभु का देखकर — विबुध (देवता)-मन प्रमुदित (अत्यन्त प्रसन्न) हुए।
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Who could recognize anyone? Everyone had forgotten their own identity in the bliss. Beholding the groom, the Fountain of Joy, rapture pervaded both sides. The all-knowing Rama recognized the gods, worshipped them mentally, and gave them seats in his mind. Seeing the Lord's grace and gentle nature, the gods were supremely pleased.
Doha6 / 6
रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर।
करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर।।321।।
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रामचन्द्र-मुख-चन्द्र-छबि (राम के चन्द्रमुख-सौन्दर्य) — लोचन (नेत्र) चारु (सुन्दर) चकोर। सादर सकल — प्रेम-प्रमोद (आनन्द) थोड़ा नहीं — पान करते।
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All eyes were like chakora birds drinking the moonlight of Rama's moon-like face, with reverence and no small joy.