बालकाण्ड
दोहा 361
6 पद
Chaupai1 / 6
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।।
सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ।।
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वामदेव — रघुकुल-गुरु ज्ञानी — फिर गाधिसुत (विश्वामित्र) की कथा बखानी। मुनि-सुयश सुनकर मन ही मन राजा — अपना पुण्य-प्रभाव वर्णन करता।
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Vamadeva, the wise guru of the Raghu clan, once again narrated the glory of Vishwamitra. The king heard the sage's fair renown and reflected in his heart upon his own good fortune.
Chaupai2 / 6
बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ।।
जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा।।
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लोग लौटे — रजायसु (आज्ञा) हुआ। सुतों (पुत्रों) समेत नृपति (राजा) गृह (घर) गया। जहाँ-तहाँ राम-विवाह सब गाया — सुयश पुनीत (पवित्र) — तीनों लोकों में छाया।
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The people were given leave and returned; the king went home with his sons. Everywhere, the marriage of Rama was being celebrated; its pure and holy fame spread through the three worlds.
Chaupai3 / 6
आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें।।
प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू।।
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जब से राम ब्याहकर घर आए — तब से अवध (अयोध्या) में अनन्त आनन्द बसता। प्रभु-विवाह से जो उछाह (उत्सव) हुआ — गिरा (वाणी)-अहिनाह (शेषनाग) भी वर्णन नहीं कर सकतीं।
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Ever since Rama came home married, unending bliss has dwelt in Ayodhya. The joy that arose from the Lord's wedding—not even the tongue of the Serpent-King can describe it.
Chaupai4 / 6
कबिकुल जीवनु पावन जानी।।राम सीय जसु मंगल खानी।।
तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी।।
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कविकुल-जीवन (कवियों के प्राण) — पावन जानकर। राम-सीता-यश — मंगल-खानी (शुभता-भण्डार)। उसमें से मैंने कुछ बखानकर कहा — निज वाणी पुनीत (पवित्र) करने हेतु।
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Knowing the glory of Rama and Sita to be the life-breath of poets and a mine of auspiciousness, I have narrated some portion of it here, to purify my own speech.
Chhand5 / 6
निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसी कह्यो।
रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो।।
उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।
बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं।।
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निज गिरा (वाणी) पावनी (पवित्र) करने कारण — राम-यश तुलसी ने कहा। रघुवीर-चरित अपार — बारिधि (सागर) — पार कवि किसने पाया? उपवीत (जनेऊ)-विवाह-उछाह (उत्सव)-मंगल — जो सादर सुनें-गावें। बैदेही (सीता)-राम-प्रसाद से — वे जन सर्वदा सुख पावें।
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To purify his own speech, Tulasidas has sung the glory of Rama. The boundless ocean of Raghubira's deeds—what poet has ever found its farther shore? Those who reverently sing or listen to the sacred thread ceremony, the wedding, and its joyful celebrations will, by the grace of Vaidehi and Rama, always find happiness.
Soratha6 / 6
सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।361।।
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सीता-रघुवीर-विवाह — जो सप्रेम गावें-सुनें। उनको सदा उछाह (उत्साह) — मंगलायतन (मंगल-निवास) राम-यश।
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Those who lovingly sing or listen to the wedding of Sita and Raghubira—for them there is ever joy, for the glory of Rama is the abode of all auspiciousness.