अयोध्याकाण्ड
दोहा 240
5 पद
Chaupai1 / 5
सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।।
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
अनुज (शत्रुघ्न)-सखा (गुह) समेत मन मग्न — हर्ष-शोक-सुख-दुख सब भूले। 'पाहि (रक्षा करो) नाथ! पाहि गोसाईं!' कहते — भूमि पर गिरे, लम्बा (दण्डवत्) प्रणाम।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
sānuja sakhā sameta magana mana. bisare haraṣa soka sukha dukha gana.
pāhi nātha kahi pāhi gosāī.
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
With his brother and friend, his mind was absorbed — joy, sorrow, pleasure, and pain were all forgotten. 'Save me, Lord! Save me, Master!'
Chaupai2 / 5
बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने।।
बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
सप्रेम वचन (सुनकर) लक्ष्मण ने पहचाना — प्रणाम करते भरत को मन में जाना। बन्धु-स्नेह-रस इस ओर — उधर स्वामी-सेवा (= कर्तव्य)।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
bacana sapema lakhana pahicāne. karata pranāmu bharata jiyaṃ jāne.
bandhu saneha sarasa ehi orā. uta
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Lakshmana recognized Bharata's loving words. He understood Bharata was prostrating. The love of the brothers surged from both sides.
Chaupai3 / 5
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।।
रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
(लक्ष्मण) मिल नहीं सकते (= दौड़कर), (पर) रुकना भी नहीं बनता — सुकवि (अच्छे कवि ही) लक्ष्मण के मन की गति कह सकें। सेवा पर भार (= जिम्मेदारी) रखकर रुके — (मन) चढ़ी चंग (= उड़ान पर)।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
mili na jāi nahiṃ gudarata banaī. sukabi lakhana mana kī gati bhanaī.
rahe rākhi sevā para bhārū.
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
He could neither go to meet him nor bear to stay — only a great poet can describe Lakshmana's inner state. He stayed, placing the burden of duty on service.
Chaupai4 / 5
कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा।।
उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
सप्रेम भूमि पर माथा नवाकर कहते — 'भरत प्रणाम करते हैं, रघुनाथ!' उठे राम — प्रेम-अधीर (= प्रेम-व्याकुल) सुनकर — कहाँ वस्त्र, कहाँ (= कुछ सूझा नहीं)।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
kahata saprema nāi mahi māthā. bharata pranāma karata raghunāthā.
uṭhe rāmu suni pema adhīrā.
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Bharata, bowing his head to the ground with love, prostrated before Raghunath. Hearing his overwhelmed voice, Rama rose.
Doha5 / 5
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
बलपूर्वक (= शीघ्र) उठाकर हृदय से लगाया कृपानिधान ने। भरत-राम की मिलनी देखकर — सबको अपना (= सुध-बुध) भूला।
रोमन लिप्यंतरण देखेंरोमन लिप्यंतरण
barabasa lie uṭhāi ura lāe kṛpānidhāna.
bharata rāma kī milani lakhi bisare sabahi apāna.
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Forcefully lifting him up, the Treasury of mercy pressed Bharata to His heart. Witnessing the meeting of Bharata and Rama, everyone forgot themselves.