बालकाण्ड

दोहा 143

5 पद

Chaupai1 / 5
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा।। तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता।।
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(शिवजी ने कहा) बरबस (जबरदस्ती) राज्य पुत्र को दिया — नारी (पत्नी) समेत वन को गमन किया। तीर्थ-वर (श्रेष्ठ तीर्थ) नैमिष विख्यात — अत्यन्त पुनीत, साधकों को सिद्धि देने वाला।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'He forcibly handed over the kingdom to his son and departed for the forest with his wife. The famous sacred site of Naimisha, supremely holy and granting success to spiritual seekers —'
Chaupai2 / 5
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा।। पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा।।
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(शिवजी ने कहा) वहाँ मुनि-सिद्ध समाज बसते — वहीं हृदय में हर्षित होकर मनु राजा चले। पथ (मार्ग) में जाते मतिधीर (धीर-बुद्धि दम्पति) शोभित — मानो ज्ञान और भक्ति ने शरीर धारण किया।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Hosts of sages and perfected beings dwelt there. There the king went with a glad heart. On the way, the steadfast couple shone like knowledge and devotion incarnate.'
Chaupai3 / 5
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा।। आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी।।
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(शिवजी ने कहा) धेनुमती (नदी) के तीर (किनारे) जाकर पहुँचे — हर्षित होकर निर्मल जल में नहाए। सिद्ध, मुनि, ज्ञानी मिलने आए — धर्म-धुरन्धर नृप-ऋषि जानकर।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'They reached the bank of the Dhenumati River and joyfully bathed in its pure waters. Sages, perfected beings, and men of knowledge came to meet them, recognizing them as royal sages and champions of righteousness.'
Chaupai4 / 5
जहँ जँह तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए।। कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना ।
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(शिवजी ने कहा) जहाँ-जहाँ सुहावने तीर्थ थे — मुनियों ने सब सादर करवाए। कृश (दुबला) शरीर, मुनि-वस्त्र पहने — सत्समाज में नित्य पुराण सुनते।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'They reverently visited all the beautiful sacred places there, guided by the sages. Their bodies were thin, they wore the garb of ascetics, and daily they listened to the Puranas in the company of saints.'
Doha5 / 5
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग। बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग।।143।।
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द्वादश-अक्षर (बारह अक्षर के) मन्त्र ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय') अनुराग (प्रेम) सहित जपते। वासुदेव के पद-पंकरुह (चरण-कमल) में दम्पति का मन अत्यन्त लगा।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'They chanted the twelve-syllabled mantra with love, and the couple's minds were deeply attached to the lotus feet of Vasudeva.'

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