बालकाण्ड
दोहा 167
5 पद
Chaupai1 / 5
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं।।
अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई।।
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(तापस ने कहा) सुनो, नृप! जग में विविध यत्न (उपाय) हैं — कष्टसाध्य, फिर होंगे या नहीं (अनिश्चित)। एक अत्यन्त सुगम (सरल) उपाय है — पर उसमें एक कठिनाई।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'Listen, O King: there are many methods in the world, but they are difficult to accomplish and may or may not succeed. There is one very easy remedy, but it has one difficulty.'
Chaupai2 / 5
मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई।।
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ।।
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(तापस ने कहा) वह युक्ति मेरे अधीन है, नृप! — (पर) मेरा तुम्हारे नगर जाना नहीं हो सकता। आज से लेकर — और जब से हुआ (जन्म लिया) — किसी के गृह-ग्राम (घर-गाँव) नहीं गया।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'That device, O King, depends on me — but I cannot come to your city. From today, and ever since I have existed, I have never gone to anyone's house or village.'
Chaupai3 / 5
जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू।।
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी।।
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(तापस ने कहा) यदि नहीं जाऊँ — तुम्हारा अकाज (नुकसान) होगा। असमंजस (दुविधा) आज आकर बना। सुनकर महीश (राजा) मृदु (कोमल) वाणी बोला — (कहा) नाथ! निगम (वेद) ने ऐसी नीति बखानी —
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'Yet if I do not go, your purpose will fail. A dilemma has presented itself today.' The king spoke in gentle words: 'Lord, the Vedas proclaim this principle—'
Chaupai4 / 5
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।।
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू।।
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(नृप ने कहा) बड़े छोटों पर स्नेह करते। गिरि (पर्वत) अपने शिर (शिखर) पर सदा तृण (घास) धारते। अगाध जलधि (समुद्र) मौलि (मस्तक) पर फेना (झाग) बहाता। सन्तत (सदा) धरनि (पृथ्वी) सिर पर रेणु (धूल) धरती।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'The great always show kindness to the small. Mountains always bear grass on their peaks. The unfathomable ocean carries foam on its surface; the earth always bears dust upon its head.'
Doha5 / 5
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल।।167।।
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ऐसा कहकर नरेश ने पद (चरण) पकड़े — (कहा) स्वामी! कृपालु होओ। मेरे लिए दुख सहो, प्रभु! — सज्जन दीनदयालु (होते हैं)।
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So saying, the king grasped the sage's feet: 'Be gracious, O Master! For my sake, please endure this trouble, Lord — for the virtuous are compassionate to the humble.'