बालकाण्ड
दोहा 168
5 पद
Chaupai1 / 5
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना।।
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही।।
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नृप को अपने अधीन जानकर — कपट-प्रवीण तापस बोला। (कहा) सत्य कहता हूँ, भूपति! सुनो — जग में मुझे कुछ दुर्लभ नहीं।
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Knowing the king was completely under his control, the ascetic, skilled in deception, spoke: 'I tell you the truth, O King, listen — nothing in the world is impossible for me.'
Chaupai2 / 5
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा।।
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ।।
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(तापस ने कहा) अवश्य मैं तुम्हारा काज करूँगा — मन-तन-वचन से तुम मेरे भक्त हो। योग, युक्ति, तप, मन्त्र का प्रभाव — तभी फलता जब दुराव (गोपनीयता) किया जाए।
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'I shall certainly accomplish your task — you are my devotee in mind, body, and speech. But yoga, technique, austerity, and the power of mantras bear fruit only when they are kept secret.'
Chaupai3 / 5
जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई।।
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई।।
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(तापस ने कहा) यदि मैं, नरेश! रसोई (भोजन) बनाऊँ — तुम परोसो, मुझे कोई न जाने। उस अन्न से जो-जो भोजन करेगा — वह-वह तुम्हारी आज्ञा अनुसरण (पालन) करेगा।
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'If I, O King, prepare the food, and you serve it — with no one knowing about me — then whoever eats that food shall obey your every command.'
Chaupai4 / 5
पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ।।
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू।।
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(तापस ने कहा) फिर उनके घर जो भी खाएगा — भूप! सुनो, वह भी तुम्हारे वश होगा। जाकर यह उपाय रचो, नृप! — सम्वत (वर्ष) भर का संकल्प करो।
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'And further, whoever eats at their homes in turn shall also come under your control, O King. Go and arrange this plan — make a vow for an entire year.'
Doha5 / 5
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिंकरिब जेवनार।।168।।
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(तापस ने कहा) नित नूतन (रोज नए) एक लाख द्विज (ब्राह्मण) — सपरिवार बुलाओ। तुम्हारे संकल्प तक मैं प्रतिदिन भोजन बनाऊँगा।
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'Every day, invite a fresh hundred thousand Brahmins with their families. For the sake of your vow, I shall prepare the feast each day.'