बालकाण्ड
दोहा 250
5 पद
Chaupai1 / 5
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।।
रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे।।
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(बन्दी ने कहा) नृपों (राजाओं) का भुजबल (बाहुबल) — विधु (चन्द्रमा) — शिवधनु राहु। गरुआ (भारी), कठोर — सबको विदित (ज्ञात)। रावण, बाण (बाणासुर) — महाभट (महायोद्धा) भारे (बड़े) — सरासन (धनुष) देखकर गवँहि (लौटकर) सिधारे (चले गए)।
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'The arm-strength of kings is like the moon, and Shiva's bow is like Rahu — heavy, hard, and known to all. Even Ravana and Banasura, those mighty warriors, turned away upon seeing the bow.'
Chaupai2 / 5
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा।।
त्रिभुवन जय समेत बैदेही।।बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही।।
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(बन्दी ने कहा) वही पुरारि (शिव) का कठोर कोदण्ड (धनुष) — राजसमाज (में) आज जो तोड़े। त्रिभुवन (तीनों लोकों) की जय — समेत बैदेही (सीता) — बिना विचार हठपूर्वक वही वरे।
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'That same formidable bow of the Destroyer of Tripura — whoever in this royal assembly today breaks it shall win the three worlds along with Vaidehi (Sita). He who does so shall marry her without further deliberation.'
Chaupai3 / 5
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे।।
परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।।
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पण (प्रतिज्ञा) सुनकर सकल भूप (राजा) अभिलाषी (उत्सुक) हुए — भटमानी (योद्धा-अभिमानी) अतिशय मन माखे (क्रोधित)। परिकर (कमरबन्द) बाँधकर अकुलाकर उठे — इष्टदेवों को सिर नवाकर चले।
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Hearing the challenge, all the kings were eager; the proud warriors were greatly provoked. They girded their loins and rose in agitation, bowing to their patron deities.
Chaupai4 / 5
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं।।
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं।।
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तमककर (क्रोध से) ताक-ताककर शिवधनु पकड़ते — उठता नहीं — कोटि (करोड़ों) भाँति बल करते। जिनके मन में कुछ विचार (बुद्धि) — वे महीप (राजा) चाप (धनुष) समीप नहीं जाते।
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Furiously they seized Shiva's bow and strained, but it would not budge despite all their efforts. Those who had any sense in their minds did not even approach the bow.
Doha5 / 5
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ।।250।।
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तमककर (क्रोध से) मूढ़ (मूर्ख) नृप (राजा) धनुष पकड़ते — उठता नहीं — लजाकर चलते। मानो भट (योद्धाओं) के बाहुबल पाकर — (धनुष) अधिक-अधिक गुरुआई (भारी होता)।
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The foolish kings furiously grasped the bow, but it would not budge, and they walked away in shame — as though the bow had gained even more weight from the strength of their arms.