बालकाण्ड
दोहा 251
5 पद
Chaupai1 / 5
भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा।।
डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें।।
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दस हजार भूप (राजा) एक बार — उठाने लगे — टरता (हिलता) नहीं — टारा (हटाया) नहीं जाता। शम्भु (शिव) का सरासन (धनुष) डगता (हिलता) कैसे? — जैसे कामी (कामुक) के वचन से सती का मन (नहीं डिगता)।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Ten thousand kings tried all at once to lift it, but it would not move an inch. Shambhu's bow did not budge at all — like the mind of a chaste woman unmoved by a lustful man's words.
Chaupai2 / 5
सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी।।
कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी।।
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सब नृप (राजा) उपहास-योग्य हुए — जैसे वैराग्य-बिना संन्यासी। कीर्ति (यश), विजय, भारी वीरता — चाप (धनुष) ने बरबस (जबरदस्ती) हराकर चले (गए)।
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All the kings became objects of ridicule — like a sannyasi without true renunciation. Having lost their great fame, prowess, and heroism, they departed with the bow having forcefully defeated them.
Chaupai3 / 5
श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा।।
नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने।।
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श्रीहत (लक्ष्मी-रहित = यश-हीन) हारकर हृदय में — राजा अपने-अपने समाज (शिविर) में जाकर बैठे। नृपों (राजाओं) को देखकर जनक अकुलाए (व्याकुल हुए) — मानो रोष (क्रोध) सने वचन बोले।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Shorn of glory, the dejected kings returned and sat down in their respective camps. Looking at the kings, Janaka grew distressed and spoke words as if mixed with indignation.
Chaupai4 / 5
दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना।।
देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा।।
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(जनक ने कहा) दीप-दीप (प्रत्येक द्वीप) के नाना भूपति (राजा) — हमारा ठाना (रखा) पण (प्रतिज्ञा) सुनकर आए। देव-दानव — मनुज (मानव) शरीर धारकर — विपुल (बहुत) वीर, रणधीर (युद्ध में वीर) आए।
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'Kings from every land came when they heard the vow I had made. Gods and demons in human guise, many mighty warriors came, ready for battle.'
Doha5 / 5
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।
पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय।।251।।
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(जनक ने कहा) कुँवरी मनोहर — विजय बड़ी — कीर्ति (यश) अत्यन्त कमनीय (सुन्दर)। पाने वाला (योग्य) — विरञ्चि (ब्रह्मा) ने मानो रचा ही नहीं — धनुष दमनीय (वश में होने वाला) नहीं।
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'A beautiful bride, great victory, and most glorious fame — yet it seems the Creator has made no one worthy to claim them, for the bow is indomitable.'