बालकाण्ड
दोहा 252
5 पद
Chaupai1 / 5
कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा।।
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई।।
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(जनक ने कहा) कहो — किसे यह लाभ नहीं भाया (चाहा)? किसी ने शंकर-चाप (शिव-धनुष) नहीं चढ़ाया। चढ़ाना-तोड़ना रहने दो, भाई! — तिल (तिल) भर भूमि से न उठा सके।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'Tell me, who would not want this prize? Yet no one could even string Shankara's bow. Forget stringing or breaking it, brothers — no one could lift it even a hair's breadth from the ground.'
Chaupai2 / 5
अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी।।
तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू।।
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(जनक ने कहा) अब कोई भटमानी (गर्वीला योद्धा) मत माखे (रुष्ट हो)। वीर-विहीन (वीर-रहित) मही (पृथ्वी) — मैंने जाना। आशा त्यागो — अपने-अपने घर जाओ। विधि (भाग्य) ने बैदेही (सीता) का विवाह नहीं लिखा।
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'Now let no proud warrior take offense, for I have concluded that the earth is devoid of heroes. Give up hope and return to your homes; it is not written in fate that Vaidehi should be married.'
Chaupai3 / 5
सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ।।
जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई।।
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(जनक ने कहा) पण (प्रतिज्ञा) छोड़ूँ तो सुकृत (पुण्य) जाए। कुँवरी कुआरी (कुँवारी) रहे — क्या करूँ? यदि जानता — भूमि (पृथ्वी) भट (वीर)-विहीन, भाई! — तो पण (प्रतिज्ञा) करके हँसाई (उपहास) नहीं होती।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'My accumulated merit will be lost if I abandon my vow; let the princess remain unwed — what can I do? Had I known the earth was bereft of warriors, I would not have made this vow and become a laughingstock.'
Chaupai4 / 5
जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी।।
माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जनक-वचन सुनकर सब नर-नारी — जानकी को देखकर दुखी हुए। लक्ष्मण माखे (रुष्ट हुए) — कुटिल (तिरछी) हुई भौंहें। रदपट (होंठ) फड़कते — नयन (नेत्र) रिसौंहें (क्रोधपूर्ण)।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Hearing Janaka's words, all the men and women were grieved, looking at Janaki. Lakshmana was enraged — his brows became crooked, his lips quivered, and his eyes blazed with anger.
Doha5 / 5
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान।।252।।
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रघुवीर के डर से कह नहीं सकते — (पर) वचन मानो बाण लगे। राम-पद-कमल पर सिर नवाकर — प्रमाण (प्रामाणिक) गिरा (वाणी) बोले।
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Restrained by his awe of the hero of the Raghus, his words flew like arrows. Bowing his head at Rama's lotus feet, he spoke in a voice of authority.