बालकाण्ड
दोहा 253
5 पद
Chaupai1 / 5
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई।।
कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी।।
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(लक्ष्मण ने कहा) रघुवंशियों में जहाँ कोई हो — उस समाज में ऐसा कोई नहीं कहता। जनक ने जैसी अनुचित वाणी कही — रघुकुल-मणि (श्रीराम) विद्यमान (उपस्थित) जानकर!
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'In any assembly where a member of the Raghu dynasty is present, no one would speak thus. Janaka has uttered such unseemly words while the jewel of the Raghu clan is here!'
Chaupai2 / 5
सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू।।
जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं।।
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(लक्ष्मण ने कहा) सुनो, भानुकुल (सूर्यवंश)-पंकज (कमल)-भानु (सूर्य)! स्वभाव कहता हूँ — कुछ अभिमान नहीं। यदि आपका अनुशासन (आज्ञा) पाऊँ — कन्दुक (गेंद) जैसे ब्रह्माण्ड उठा लूँ।
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'Listen, O sun to the lotus of the Solar dynasty! I speak my nature, not out of pride. If I have your command, I can lift the entire universe like a ball.'
Chaupai3 / 5
काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी।।
तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना।।
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(लक्ष्मण ने कहा) कच्चे घट (घड़े) जैसे फोड़कर डालूँ — मेरु (पर्वत) मूलक (मूली) जैसे तोड़ सकता हूँ। आपके प्रताप-महिमा से, भगवान! — बापुरो (बेचारा) पुराना पिनाक (शिव-धनुष) क्या (है)?
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'I can smash it to pieces like an unbaked clay pot; I can break Mount Meru like a radish. By your glory, my Lord, what is this wretched old bow of Pinaka?'
Chaupai4 / 5
नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ।।
कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं।।
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(लक्ष्मण ने कहा) नाथ! ऐसा जानकर आज्ञा हो — कौतुक (खेल) करूँ — देखा जाए। कमल-नाल (कमल की डंठल) जैसे चाप (धनुष) चढ़ाऊँ — सौ योजन प्रमाण (दूरी तक) लेकर दौड़ूँ।
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'Lord, knowing this, just give the command, and watch the sport I shall perform. I shall string the bow as easily as threading a lotus stem, and then run a hundred yojanas carrying it.'
Doha5 / 5
तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ।
जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ।।253।।
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(लक्ष्मण ने कहा) छत्रक (छतरी/मशरूम)-दण्ड (डण्डी) जैसे तोड़ूँ — आपके प्रताप-बल से, नाथ! यदि न करूँ — प्रभु-पद (चरणों) की सपथ (शपथ) — हाथ में धनुष-भाथ (तरकश) न धरूँ।
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'I shall break it like snapping a mushroom stem, by your power and might, Lord. If I fail to do so, I swear by the Lord's feet, I shall never again take up bow, arrow, or quiver.'