बालकाण्ड
दोहा 254
5 पद
Chaupai1 / 5
लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले।।
सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने।।
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लक्ष्मण ने जो सक्रोध (क्रोधपूर्वक) वचन बोले — डगमगाई मही (पृथ्वी), दिग्गज (दिशाओं के हाथी) डोले। सकल लोक, सब भूप (राजा) डरे। सीता के हृदय में हर्ष — जनक सकुचाए (लज्जित)।
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The words that Lakshmana spoke in anger made the earth shake and the elephants of the directions tremble. All the worlds and all the kings were frightened; Sita's heart rejoiced, and Janaka was abashed.
Chaupai2 / 5
गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं।।
सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे।।
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गुरु, रघुपति, सब मुनि — मन में मुदित (प्रसन्न) — बार-बार पुलकित हुए। सयन (इशारे) से रघुपति ने लक्ष्मण को रोका — प्रेम समेत निकट बैठाया।
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The guru, Raghupati, and all the sages were inwardly delighted, thrilling again and again. Rama gently restrained Lakshmana with a glance and seated him near with affection.
Chaupai3 / 5
बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी।।
उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा।।
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विश्वामित्र ने शुभ समय जानकर — अत्यन्त स्नेहमय वाणी बोले। (कहा) उठो, राम! भव (शिव)-चाप (धनुष) भंजो (तोड़ो)। तात! जनक का परिताप (दुख) मेटो (मिटाओ)।
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Then Vishwamitra, knowing the moment to be auspicious, spoke in a most affectionate voice, 'Rise, Rama, and break Shiva's bow. Remove Janaka's anguish, dear son.'
Chaupai4 / 5
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा।।
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ।।
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गुरु-वचन सुनकर चरणों पर सिर नवाया — न हर्ष, न विषाद — कुछ उर (हृदय) में नहीं आया। सहज स्वभाव से उठकर खड़े हुए — ठवनि (ठाट) — युवा मृगराज (सिंह) को लजाए।
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Hearing the guru's words, Rama bowed his head at his feet. No joy or sorrow arose in his heart. He stood up with natural ease — his stance would put a young lion to shame.
Doha5 / 5
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।
बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग।।254।।
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उदयगिरि-मंच (ऊँचे मंच) पर रघुवर-बालपतंग (युवा सूर्य) उदित (प्रकट) हुए। सन्त-सरोज (कमल) सब विकसे (खिले) — लोचन (नेत्र)-भृंग (भौंरे) हर्षित।
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Like the young sun rising on the eastern mountain, Rama appeared on the high platform. The saints blossomed like lotuses, and the eyes of all were delighted like bees.