बालकाण्ड
दोहा 258
5 पद
Chaupai1 / 5
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।।
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।।
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नयन (आँखें) भरकर शोभा अच्छी तरह निरखी (देखी) — पिता का पण (प्रतिज्ञा) स्मरण करके फिर मन क्षुब्ध। (सीता ने सोचा) अहह! तात (पिता) ने दारुण (कठोर) हठ ठानी — समझते नहीं कुछ लाभ-हानि।
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Gazing intently to fill her eyes with his beauty, she then remembered her father's vow and her mind was troubled again. 'Alas, father has made such a cruel vow, understanding neither gain nor loss.'
Chaupai2 / 5
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई।।
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा।।
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(सीता ने सोचा) सचिव (मन्त्री) सभय (भयभीत) — कोई शिक्षा (सलाह) नहीं देता। बुध (विद्वान)-समाज में बड़ा अनुचित होता। कहाँ धनुष — कुलिश (वज्र) से भी कठोर — कहाँ श्यामल (साँवले), मृदुगात (कोमल शरीर), किशोर।
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'The ministers are all too afraid to advise him; in a learned assembly, this is a great impropriety. On one hand the bow, harder even than a thunderbolt — on the other, this delicate, dark-limbed youth.'
Chaupai3 / 5
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा।।
सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी।।
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(सीता ने सोचा) विधि (ब्रह्मा)! किस भाँति उर (हृदय) में धीरज धरूँ? सिरस-सुमन (शिरीष-फूल) के कण (टुकड़े) से हीरा बेधा (छेदा) जाए? सकल सभा की मति (बुद्धि) भोरी (भ्रमित) हुई — अब मुझे शम्भु-चाप (शिव-धनुष) की गति (भाग्य) तोरी (तेरी)।
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'How can I find courage in my heart, O Creator? Can a diamond be pierced with the petal of a shirisha flower? The understanding of the entire assembly has been dulled; now only Shiva's bow knows my fate.'
Chaupai4 / 5
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।।
अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब सय जाहीं।।
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(सीता ने सोचा) निज जड़ता (मूर्खता) लोगों पर डाली — (कहती हूँ) हरुअ (हलका) होओ — रघुपति को निहारकर। सीता के मन में अत्यन्त परिताप (कष्ट) — लव (क्षण)-निमेष (पलक) — युग-सय (सौ युग)-जैसे जाते।
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'Let them blame their own dullness on others — may the bow become light as they behold Raghupati.' The anguish in Sita's heart was extreme; each moment passed like an age.
Doha5 / 5
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।
खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल।।258।।
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प्रभु को चितवकर (देखकर) फिर मही (भूमि) देखतीं — राजत (शोभित) लोल (चंचल) लोचन (नेत्र)। खेलते मनसिज (कामदेव)-मीन (मछली) — दो — मानो विधु (चन्द्र)-मण्डल (वृत्त) में डोल (हिलती)।
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She gazed at the Lord and then looked down at the ground, her eyes restlessly moving — as though two fish of Kamadeva were playing in the pool of the moon.