बालकाण्ड
दोहा 271
5 पद
Chaupai1 / 5
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
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(श्रीराम ने कहा) नाथ! शम्भुधनु (शिव-धनुष) भंजनिहारा (तोड़ने वाला) — होगा कोई एक दास (सेवक) आपका। आज्ञा क्या? — मुझसे क्यों नहीं कहते? सुनकर क्रोधी मुनि रिसाकर (क्रोधित होकर) बोले।
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'Lord, the one who broke Shambhu's bow must be some servant of yours. What is your command? Why not tell me?' Hearing this, the wrathful sage grew angrier still.
Chaupai2 / 5
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।।
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
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(परशुराम ने कहा) सेवक वह जो सेवकाई (सेवा) करे — अरि (शत्रु)-करनी करके लड़ाई करनी चाहिए। सुनो, राम! जिसने शिवधनु तोड़ा — सहस्रबाहु-सम वह मेरा रिपु (शत्रु)।
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'A servant is one who serves; for hostile acts, one wages war. Listen, Rama — whoever broke Shiva's bow is my enemy, as was Sahasrabahu (Kartavirya).'
Chaupai3 / 5
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।
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(परशुराम ने कहा) वह समाज छोड़कर अलग आए — नहीं तो सब राजा मरेंगे। मुनि-वचन सुनकर लक्ष्मण मुस्कुराए — परशुधर (परशुराम) को अपमानित करके बोले।
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'Let that person come forward, apart from this assembly, or else all the kings shall die.' Hearing the sage's words, Lakshmana smiled and spoke, feeling slighted by the axe-bearer.
Chaupai4 / 5
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
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(लक्ष्मण ने कहा) बहुत धनुहीं (छोटे धनुष) तोड़ीं लड़कपन में — कभी ऐसी रिस (क्रोध) नहीं की, गोसाईं! इस धनुष पर ममता (लगाव) किस कारण? सुनकर रिसाकर (क्रोधित होकर) भृगुकुलकेतु (परशुराम) बोले।
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'We have broken many little bows in our childhood, but you never showed such anger then, my lord. Why this special attachment to this particular bow?' Hearing this, the banner of the Bhrigu clan spoke in fury.
Doha5 / 5
रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार।।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।271।।
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(परशुराम ने कहा) रे नृपबालक (राजकुमार)! कालवश (मृत्यु के वश) — बोलते तुझे सँभार (सावधानी) नहीं। धनुही (छोटा धनुष) समान — त्रिपुरारि (शिव) का धनुष? सकल संसार में विदित (प्रसिद्ध)!
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'O foolish prince, child in the grip of Death — you speak without any sense. This bow of the Destroyer of Tripura is famed throughout the world — do you compare it to some toy bow?'